Wednesday, December 13, 2017
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कैराना- रंगमंच की प्रयोगशाला

 

अजय भट्टाचार्य  (वरिष्ठ पत्रकार)

अजय भट्टाचार्य
(वरिष्ठ पत्रकार)

पश्चिमीउत्तर प्रदेश के शामली जिले का क़स्बा कैराना इन दिनों खासा चर्चा में है। कथित ३४६ हिन्दू परिवारों द्वारा मुस्लिमों के भय के कारण पलायन करने की बात स्थानीय सांसद हुकुम सिंह ने बकायदा सूची जारी कर की है। तभी से यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। लेकिन अब जो ख़बरें कैराना से छनकर आ रही हैं वे अलग ही कहानी बयान करती हैं। विभिन्न चैनलों और डिजिटल मीडिया ग्रुपों द्वारा कैराना जाकर की गयी ग्राउंड रिपोर्टिंग पलायन के पीछे मुस्लिमो के आतंक को सिरे से ख़ारिज करती है। हाँ यह तथ्य जरूर रेखांकित हुआ है कि जेल में बंद एक मुस्लिम गुंडे द्वारा रंगदारी मांगने से घबराये कुछ लोग जरूर कैराना छोड़ गए हैं। यह ठीक वैसा ही मामला बनता नजर आ रहा है जैसे एक ओसामा बिन लादेन या बगदादी की आड़ में पूरे मुस्लिम समाज को आतंकवादी ठहराना। जबकि कैराना से सिर्फ हिन्दू ही नहीं बल्कि बड़ी संख्या में मुसलमान भी पलायन कर गए हैं। कैराना से पलायन की वजह जाति विशेष के अधिसंख्य होने से ज्यादा बेरोजगारी है , बेहतर जीवन की जिजीविषा है और बच्चों के भविष्य सवांरने की लालसा है। माननीय सांसद महोदय द्वारा जो सूची जारी की गयी है उनमें कई नाम ऐसे हैं जो १०-१५ साल पहले ही कैराना छोड़ गए हैं।
keranaअब प्रश्न यह उठता है कि कैराना या तत्सम अन्य स्थानों पर यह स्थिति उत्पन्न क्यों होती है ? जनसंख्या के बाहुल्य को सीधे-सीधे दमन, शोषण, उत्पीड़न का स्रोत क्यों मान लिया जाता है ? २०१४ के लोकसभा चुनावों से पहले मुजफ्फरनगर का प्रहसन और उसके परिणाम सभी को मालूम हैं। खूब राजनीति तब भी हुई थी और अब भी होगी। केंद्र में सत्ता प्रतिष्ठान का कलेवर बदलते ही जिस तरह से लव जिहाद , गोहत्या निर्मूलन , घर वापसी जैसे क्रांतिकारी प्रयोग हुए और हो रहे हैं उसकी प्रतिध्वनि कहीं न कहीं तो सुनाई पड़नी ही थी। संयोगवश कैराना को उसी प्रतिध्वनि के रूप में सुने जाने की कोशिश की गयी है। जबकि सच्चाई यह है कि वहां मुसलमानो से कोई खतरा हिन्दू समाज को नहीं है। इसकी तसदीक इस बात से की जा सकती है कि जब मुजफ्फरनगर दंगों में झुलस रहा था तब कैराना शांत था।
कैराना के बहाने ही सही लेकिन यह चिंतन होना स्वाभाविक है कि बहुसंख्यक आबादी के उन्माद से बचने के लिए अल्पसंख्यक आबादी गोलबंद होने लगती है। संख्या का का यह खेल हर धर्मावलम्बी पर लागू होता है। जरा ध्यान से देखिये तो आपके अपने आस-पास एक कैराना दिखाई देगा। मुंबई और आस-पास नजर दौड़ाइए। कुछेक इलाके पूरी तरह से सामुदायिक जमावड़े के प्रतीक बन गए हैं। हालात यहां तक जा पंहुचे हैं कि आवासीय इमारतों में भी जाती और धर्म के आधार पर घर ख़रीदे-बेचे जाते हैं। हिन्दू बहुल सोसाइटी में मुसलमान को घर नहीं मिलता और मुस्लिम बहुल इलाकों में कोई हिन्दू को घर नहीं देता। सिर्फ कैराना को आधार बनाकर यह धारणा स्थापित करना गलत होगा कि क्षेत्र विशेष जातीय नस्लवाद की गिरफ्त में है और समुदाय विशेष कहर ढा/सह रहा है।
अब इस मुद्दे को लेकर तमाम राजनितिक दल अपने-अपने जाँच दल कैराना भेजेंगे और अपनी सुविधानुसार कैराना की तस्वीर पेश करेंगे। चूँकि अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं इसलिए मतों के ध्रुवीकरण का खेल परवान चढ़ेगा। ध्यान देने की बात यह है कि जेल में बैठा कोई गुंडा एक कस्बे को आतंकित कर सकता है तो उसके पीछे किसकी ताकत है ? हुकुमसिंह ने उस रंगबाज़ की बात क्यों नहीं की जिसकी रंगदारी वसूली के डर से कुछ व्यापारी पलायन कर गए। सवाल यह भी है की खुलेआम मुसलमान मुक्त भारत की बात करने वाले कौन सा सन्देश देना चाहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन सवा सौ करोड़ भारतीयों की बात करते हैं उनमे देश के मुस्लमान भी शामिल हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि भाजपा के अंत:पुर में ही कोई कोटरी मोदी के ‘सबका साथ सबका विकास’ की हवा निकालने में लगी हो। बहरहाल कैराना वर्तमान राजनीतिक रंगमंच की नई प्रयोगशाला बनता दीख रहा है।

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