Saturday, August 19, 2017
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क्या ओलम्पिक के लायक है भारत ?

कौन नहीं चाहेगा कि ओलम्पिक जैसा खेलों का महा आयोजन भारत में भी हो। किन्तु क्या इसके लायक है भारत ? प्रश्न यही है।  क्योंकि ओलम्पिक आयोजित कराना न केवल टेढ़ी खीर है बल्कि देश की इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है कि क्या वो दुनिया को अपने यहां आमंत्रित कर पाएगा ? हालांकि ओलम्पिक भारत में हो ऐसा स्वप्न जरूर पिछली सरकारों के खेल मंत्रालय में पाला गया किन्तु इसे पटल पर रखने का साहस कोई नहीं दिखा सका। ये कोई मामूली आयोजन नहीं है और न ही एशियाड या कॉमनवेल्थ गेम्स करा लेने पर ओलम्पिक जैसे आयोजन की अनुमति मिलती है।  इसके लिए बहुत बड़े पैमाने पर गोलबंदी भी होती है तथा देश की स्थिति को भी नज़र में रखा जाता है।  हाँ, जरूरी नहीं कि ओलम्पिक में भारत का प्रदर्शन बेहतर हो तभी इसका आयोजन कराया जा सकता है।  यदि ऐसा होता तो भारत कभी ये आयोजन नहीं करा पाएगा क्योंकि उसकी ओलम्पिक में दशा दयनीय है।  फिर भी इसके आयोजन का ख़्वाब देखना और उसे पटल पर लाकर रखना तथा योजना बनाने की दिशा में सोचना निश्चित ही मजबूत इच्छा शक्ति वाली सरकार का कार्य है और वो नरेंद्र मोदी की सरकार दिखा रही है। ये बहुत सुखद है कि मोदी सरकार साल 2032 में भारत में ओलिंपिक खेलो के आयोजन का दावा ठोकने का विचार कर रही है। खेल मंत्रालय की ओर से 2032 में ओलिंपिक को आयोजित कराए जाने होने वाले नफे – नुकसान का आकलन किया जा रहा है।  भारत में बड़े आयोजन हुए हैं।  एशियाड भी हुआ और कॉमनवेल्थ गेम्स भी हुए।  अभी जूनियर फीफा फ़ुटबाल विश्वकप भी खेला जाना है। यानी भारत महा आयोजनों के लिए न केवल अनुभव प्राप्त देश है बल्कि उसके पास स्थानाभाव भी नहीं है।  मगर जो असल बात है वो ये कि क्या इच्छा शक्ति है ? या क्या इतने बड़े आयोजन को संपन्न कराने  जैसी आर्थिक स्थिति है ? क्या देश में एकजुटता है ? या कि देश में जो जातीय दुराव , या आतंकवादी भय जैसे बादल मंडराते रहते हैं उस पर अंकुश भी लगाए जा सकते हैं और पूरा देश एक स्वर में ओलम्पिक जैसे आयोजन को कराए जाने के पक्ष में सरकार के साथ हो सकता है ? बहुत गंभीर प्रश्न है जिसने आजतक ओलम्पिक को भारत से दूर रखा है।  जीवट वाली सरकार का होना आवश्यक होता है और मोदी सरकार चूंकि बहुमत वाली सरकार है और उसके फैसले संभव है ओलम्पिक के पक्ष में लिए जाएं और प्रक्रिया शुरू करने जैसी कार्यवाही भी होने लगे।  ये उम्मीद तो की ही जा सकती है।

पिछले दिनों आई एक खबर में आईओए ने सरकार को इन खेलों की दावेदारी पेश करने का सुझाव दिया है।  और अब खेल मंत्रालय इसके मद्देनजर अध्ययन कर रहा है। ये सच है कि भारत अब तक किसी भी ओलिंपिक में 10 मेडल तक नहीं जीत पाया है मगर भारतीय ओलिंपिक संघ यानी आईओए देश में ओलंपिक खेलों की मेजबानी का दम भर रही है। ये ही बड़ी बात है। कुछ दिन पहले आईओए के अध्यक्ष एन.रामचंद्रन ने दावा किया था कि भारत सरकार ने आईओए को ओलिंपिक खेलों की मेजबानी का दावा ठोकने की हरी झंडी दे दी है।2020 में टोक्यो ओलिंपिक के बाद 2024 और 2028 के ओलिंपिक की मेजबानी के लिए पेरिस और लॉस एंजेल्स को सौंपी जाएगी।  2032 के ओलिंपिक खेलों की मेजबानी को निर्धारित करने की प्रक्रिया 2020 में ही शुरू होगी। आईओए इससे पहले 2030 के एशियाई खेलों के मेजबानी की दावेदारी का इरादा भी जता चुका है। हालांकि ओलिंपिक की दावेदारी पेश करने के लिए अभी तक किसी शहर का चयन नहीं किया गया है लेकिन चर्चा है कि इसके लिए दिल्ली का नाम आगे किया जा सकता है। दिल्ली में इससे पहले साल 2010 में कॉमनवेल्थ खेलों का आयोजन किया गया था।  साल 1982 में एशियाई खेलों के आयोजन के बाद यह भारत में खेलों का सबसे बड़ा आयोजन था। हालांकि इस आयोजन के बाद घोटालो की ऐसी बाढ़ सामने आई कि तत्कालीन सरकार को जवाब देना भी मुश्किल हुआ तथा अपने मंत्री तक को हटाना पड़ गया था।  क्या भ्रष्टाचार मुक्त आयोजन की संभावनाएं इस देश में स्थापित की जा सकती है ? ये सवाल भी मुंहबाए खड़ा है।

ऐसे मिलती है मेजबानी  

दरअसल लगभग  7 से 8 साल पहले ये तय हो जाता है कि अगले ओलंपिक खेलों का आयोजन किस देश में होगा। आईओसी के जितने सदस्य देश हैं उनमे वोटिंग होती है और इसके बाद मेजबान देश का फैसला होता है।  जैसे ये बात अभी से तय है कि 2020 का ओलंपिक टोक्यो में आयोजित होना है।  दरअसल, इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी यानी आईओसी की देखरेख में तमाम शहर ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए ‘बिड’ करते हैं। बड़े बड़े प्रेजेन्टेशन तैयार किए जाते हैं। इस ‘बिड’ को जीतने के लिए ही लामबंदी होती है , जुगाड़ बैठाए जाते हैं। अनाप-शनाप पैसा तो यहीं खर्च करना पड़ जाता है। अपने पक्ष में ‘लॉबिंग’ करनी पड़ती है। क्योंकि ये तय है कि आधुनिक दौर में ओलंपिक खेलों की मेजबानी पूरी दुनिया को अपनी ताकत दिखाने का बेहतरीन मौका होता  है। याद कीजिये चीन ने अमेरिका का रूतबा ख़त्म करने के लिए न केवल ओलम्पिक कराया बल्कि उसे मात भी दी। कई तिकड़म और बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर का भरोसा देने के बाद वोटिग होती है और वोटिंग में इस बात का फैसला होता है कि ओलंपिक खेल दुनिया के किस हिस्से में होंगे।

सवाल भारत की दावेदारी का 

प्रश्न  ये है कि यदि भारत ओलम्पिक आयोजित कराने के लिए सोचता है तो किस आधार पर अपनी बात रख पाएगा ? दुनिया जानती है कि भारत ने 2010 में कॉमनवेल्थ खेलों की मेजबानी की थी। इससे पहले भारत में 1951 और 1982 में एशियन गेम्स का आयोजन किया जा चुका है।  हॉकी, बैडमिंटन, शूटिंग जैसे तमाम खेलों की विश्व स्तरीय प्रतियोगिताएं आए दिन भारत में होती रहती हैं।  कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन के बाद ‘इफ्रांस्ट्रक्चर’ भी निश्चित तौर पर बेहतर हुआ है। यहां तक कि भारत दुनिया के उन गिने चुने 20-22 देशों में से एक है जहां फॉर्मूला वन का आयोजन हो चुका है।  क्या ये उपलब्धिया भारत को ओलम्पिक में अपना दावा पेश करने में मजबूत बना सकती है ? उत्तर है नहीं।

क्या अड़चनें है ?

पहले ही मैं लिख चुका हूँ सबसे बड़ी अड़चन इच्छाशक्ति की है। आप समझ सकते हैं कि फॉर्मूला वन पूरी दुनिया को भारत की स्पोर्टिंग ताकत दिखाने का एक बेहतरीन मौका था। लेकिन 2-3 सीजन के बाद फॉर्मूला वन का आयोजन भारत में बंद हो गया। कहते हैं कि आयोजकों को भारत में चलने वाली ‘लाल फीताशाही’ से तकलीफ थी। जरूरत से ज्यादा टैक्स थे। इस तरह इंडियन ग्रां प्री बंद हो गई।  दोबारा कब शुरू होगी कोई नहीं जानता है। ग्रेटर नोएडा के रेसिंग ट्रैक पर अब ट्रकों की रेस होती है।  दूसरी बड़ी वजह है राजनीति प्रतिद्वंद्वता। विवादों में रहना और विवाद कराने के लिए  उसकी कमी ढूंढ  कर हो हल्ला शुरू कर देना। ऐसी ही एक सोच उमा भारती जब खेल मंत्री बनी थीं, तो उन्होंने 2012 में ओलंपिक खेलों की मेजबानी के लिए दावेदारी करने की बात कह कर रखी थी।  मगर सबकुछ खत्म भी हो गया और वो सोच ही डाब गयी। क्योंकि सरकार बदल गई, तमाम किस्म के अंदरूनी मतभेद हुए और आखिरकार श्रेय लुटने के झगड़े में वो वायदा फाइलों में बंद होकर रह गया। अब एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, क्या पता इस बारे में कुछ सार्थक चर्चा की जाए। जीएसटी लागू हो जाने के बाद अब तमाम तरह के टैक्सों से भी निजात मिल सकती है। किन्तु इसके बावजूद भष्ट्राचार का राक्षस सिर पर बैठा हाहालार करता है , क्या उससे निपटना आसान होगा ? हर आयोजन के पीछे भष्ट्राचार का साया साथ चलता है।  जिस देश के तमाम मंत्री जेल की सजा काट चुके हों, जिस देश में भष्ट्राचार हटाने के लिए तमाम आंदोलन चल रहे हों, उस देश में ओलंपिक की मेजबानी के बारे में सोचने से पहले उसमें होने वाले भष्ट्राचार की काट खोजनी होगी। जिस कॉमनवेल्थ खेल की मेजबानी को ओलंपिक की मेजबानी का दावा करने के लिए सीढ़ी बनाया जा सकता था, उसने देश की इज्जत को मिट्टी में मिला दिया। भष्ट्राचार का आलम ये था कि कॉमनवेल्थ खेलों के मुखिया और सांसद सुरेश कलमाडी अपने कमांडरों के साथ जेल जाना पड़ा था। अभी तो बात दावेदारी की है, उसके बाद अगला कदम है दावेदारी पर समर्थन जुटाना। चलिए अब अगर ये मान लें  कि भारत सरकार ओलंपिक की मेजबानी का दावा करने का मन बना भी रही है तो भी पहली बार में ही  ओलंपिक खेलों के आयोजन का मौका भारत को मिल जाएगा- ये बात हजम नहीं होती।  इसके लिए सतत जुटे रहना पड़ता है।  क्या सरकार इतनी शक्तिशाली है ? या कि क्या भरोसा  की ये सरकार न हो और दूसरे सरकार इस सपने को रद्दी की टिकरी में डाल दे। भारत में तो यही होता आया है।  देश तो  बादकी बात हो जाती है पहले अपने सत्ता सुख और अपने विरोधियों को ठिकाने कैसे लगाया जा सकता है , उसे देखा और समझा जाता है।  इसीलिये तो वे तमाम लोग ऐसे समय मुंह बंद कर लेंगे जो भारतीय एथलीटों के खराब प्रदर्शन पर चीखते चिल्लाते और सरकार को गालियां देने लगते हैं।  क्या वे ऐसे आयोजन को अपने देश में आयोजित करा सकने के लिए एकजुट नहीं हो सकते ? नहीं हो सकते।  ये उत्तर तमाम तरह की योजना को मटियामेट कर देता है।  इससे कैसे निपटती है सरकार देखना दिलचस्प होगा।

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