Saturday, October 21, 2017
अभी अभी

डोलती महाराष्ट्र की राजनीति

जब कभी किसी चुनाव में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता तब अक्सर उन्हें बल मिल जाता है जिसके पास न तो कोई आधार होता है , न ही जनाधार।  यानी कम सीटें जीतने वाली पार्टी बब्बर शेर बन जाती है और निर्दलीय चुनकर आने वाले इक्का -दुक्का उम्मीदवार किसी सोने की चिड़िया की तरह नजर आने लगते हैं।  ये विडम्बना सत्ता को प्राप्त करने वालो की नहीं है बल्कि जनता की है , जिसने जो कुछ भी चुना , उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता और राजनीतिक पार्टियां अपने सत्ता सुख ले लिए वो सब कर सिंहासन प्राप्त कर लेती है जो जनता नहीं चाहती। मज़ा ये है कि ऐसे दल जनता के ही कंधो पर बन्दूक रख गोली दागते हैं , ये कह कर कि हम राज्य का या देश का या शहर का भला करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। इसे गंभीरता से समझना होगा। राजनीतिक दलों की मनमानी रोकने के लिए कोई भी लोकतांत्रिक उपाय नहीं है। क्योंकि संविधान ने बहुमत साबित करने की प्रक्रिया रखी है। और ये एन केन प्रकारेण किसी भी तरह से प्राप्त कर लिया जाता है। मुंबई में कुछ ऐसा ही चल रहा है। बीएमसी चुनाव में जनता ने शिवसेना और भाजपा को सत्तासीन होने का अपना फैसला सुनाया है , किन्तु दोनों दलों के मध्य मतभेद की वजह से कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों की चांदी होने लगी है। सत्ता के लिए तड़प क्या होती है , ये आसानी से देखा जा सकता है। कांग्रेस सबसे छोटी पार्टी होने के बावजूद आज सबसे ज्यादा कीमती हो गयी है। शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस के आगे पीछे घूमती दिखने लगी है। अगर इस विकल्प पर भी वो सोच रही है कि कांग्रेस या एनसीपी को मिलाकर सत्ता सुख भोगा जाए तो भी उसे अपने बड़े होने का सारा महत्व खो देना होगा।  यही हाल भाजपा का भी है।  सत्ता के लिए वो भी तलाश रही है छोटो को। किन्तु उसमे एक बहुत ख़ास बात ये दिख रही है कि उसने पहले शिवसेना को साथ में आ जाने के अपने सारे दरवाजे खुले रखें हैं। और यही उसकी विशेषता है कि वो मुम्बई को , उसके जनाधार को महत्त्व दे रही है। उसकी हेकड़ी नहीं दिख रही , मगर शिवसेना का दम्भ दिख रहा है। उसे अपना भविष्य भाजपा के साथ रहकर अंधकारमय दिखता है , तो भाजपा को उज्जवल।  जो हो मगर मुंबई के जनाधार को पटल पर प्राथमिकता देना दोनों बड़े दलों के लिए आवश्यक है। अपने अपने स्वार्थ को परे रखते हुए उन्हें साथ में आना चाहिए , और मुंबई की सेवा करनी चाहिए। किन्तु अफ़सोस यह भी है कि ऐसा होता दिखता नहीं।  जो स्थितियां बन रही है , उसमें कांग्रेस की पो बारह है।  कांग्रेस कुछ ऐसे रूप में आ गयी है मानो उसके बगैर बीएमसी की बात नहीं सधती।  ऐसा असल में है भी।  क्योंकि महज चार विकल्पों के बीच बीएमसी का सिंहासन है।  बैठको का दौर जारी है मगर इन बैठको में होगा सिर्फ यही कि भाजपा को सत्ता से दूर कैसे रखा जाए। अब जबकी उद्धव ठाकरे ने साफ़ कह दिया है कि मेयर पद तो शिवसेना का ही होगा।  तब ये बात खत्म हो  वो भाजपा से हाथ मिलाने जा रहे हैं।  भाजपा से हाथ मिलाने का अर्थ होता ढाई ढाई साल के मेयर का होना। जो अब नहीं दिखता। कुछ इस प्रकार की स्थिति निर्मित हो सकती है। 227 सदस्यों की बीएमसी में मेयर पद की वोटिंग के दौरान 9 मार्च को कांग्रेस और एनसीपी सदन में न जाकर बाहर रह सकती हैं जिससे सदन की कुल तादाद 187 हो जाती है जिसके लिए बहुमत का आंकड़ा खिसककर 94 हो जाएगी।  फिलहाल 84 सीट शिवसेना की और 4 निर्दलीय उसके साथ आ चुके हैं। एक और निर्दलीय गवली की बेटी गीता गवली का भी उनके साथ आना तय हो चुका है इस तरह ये आंकड़ा 89 का हो गया है। राज ठाकरे के 7 पार्षद भी शिवसेना के साथ आने वाले हैं।  इस तरह शिवसेना का आंकड़ा 96 हो जाएगा और बहुमत के 94 के आंकड़े के ऊपर पहुंच जाएगा। यानी शिवसेना की बहार बीएमसी में दिखाई देने लगेगी।  मगर क्या इस स्थिति को नज़रअंदाज किया जा सकता है कि शिवसेना यदि बीएमसी के सिंहासन पर काबिज हो भी जाएगी तो क्या सत्ता संचालन ढंग से कर पाएगी ? क्या संभव होगा कांग्रेस इत्यादि दल उसके कार्यों में टांग न अड़ाएंगे ? जो हो मगर हो मुंबई का भला।

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