Saturday, August 19, 2017
अभी अभी

देशभक्ति , देशद्रोह और विवाद

amit1देशभक्ति,देशद्रोह और विवाद,पिछले एक हफ्ते से ज्यादा समय से इस  विषय ने भारत की फिजाँ को खराब कर रखा है। देशभक्ति और देशद्रोह के मामले में क्या राजनीति , क्या मीडिया और क्या जनता , सब दो धड़ों में बंटे  हुए हैं।  लगभग सारे खुद को देशभक्त साबित करने पर तुले हैं और दूसरों को  कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। जब सारे ही देशभक्त हैं तो फिर विवाद कैसा ? फिर ये लड़ाई क्यों ? फिर ये हर दल , हर वर्ग के मध्य खाई कैसी ? क्यों नहीं सब एकसाथ मिलकर अपने देश को मजबूत करते हैं ? अगर ऐसा नहीं है तो यह स्पष्ट है कि कहीं दाल में कुछ काला अवश्य है।  यह काला सिर्फ कन्हैया या भगोड़े उमर  खालिद , उसके साथियों के कारण नहीं बल्कि राजनीतिक दलों में भी है और मीडिया के साथ साथ जनता के बीच में भी।  अन्यथा कोई कारण नहीं होता कि सब एक दूसरे पर उंगली ताने नजर आते।  कोई भी इस बात पर गौर नहीं करना चाहता कि इन सब की वजह से उनका अपना देश कमजोर होता जा रहा है। एक तरफ तो सारे के सारे देशभक्ति का सर्टिफिकेट देना या लेना नहीं चाहते , दूसरी तरफ बाँटते , मनवाते नजर आते हैं। कोई कहता है मेरे खून में देशभक्ति है और इसके अलावा मेरे पास कुछ नहीं है तो कोई कहता है अगर ऐसा है  तो देश विरोधियों के समर्थन में खड़े क्यों हो ? कोई भारत माता की जय घोष के साथ आक्रोशित होकर अगर देशविरोधी पर टूटता है तो कोई उसे कटघरे में खड़ा करके प्रश्न पूछता है कि तिरंगा हाथ में लेकर और भारत माता की जय कह कर कोई देशभक्त नहीं समझा जा सकता। कुलमिलाकर माहौल में जहर है।  जहर है और भारत माता इस जहर के घूँट को पी रही है किन्तु किसीको नहीं दिख रहा।
भारत सरकार पर उंगलियां उठाई जा रही है।  उस सरकार पर जो अभी डेढ़ -दो वर्ष से ही काबिज हुई है।यह भी एक तरह से मान्य हो जाता अगर सरकार के खिलाफ ही केवल मोर्चाबंदी होती किन्तु नेपथ्य में इस देश की सुप्रीम पावर के प्रति जिस तरह से संदेह और उस पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया जाने लगा है , चिंता का विषय यह है।  सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों पर प्रश्न खड़ा करते हुए मोदी सरकार पर निशाना साधा जा रहा है यह चिंता का विषय है।  अफजल गुरु हो या याकूब मेमन हो या कोई भी ऐसा आतंकवादी या फैसला अगर अदालत द्वारा आया हुआ है तो उसे मान्य ही नहीं बल्कि शिरोधार्य करना हर भारतवासी का कर्तव्य होता है।  उस पर प्रश्न चिन्ह खड़ा नहीं किया जा सकता किन्तु इसी आड़ में खेल खेला जा रहा है जिससे अदालती फैसलों पर संदेह की बू को फिजां में व्याप्त किया जा सके।  अब ये कोई राजनीतिक दल या मीडिया या जनता न जान रही हो , संभव नहीं।  बावजूद टीका टिप्पणी से कोई बाज नहीं आ रहा। हम जिस शाखा पर बैठे हैं उसीको काट रहे हैं। उस पर ही संदेह की दृष्टि डाल  रहे हैं , इससे बड़ी बेवकूफी या मूर्खता क्या हो सकती है। क्या इसे विदेशी ताकतों की जीत नहीं माना जा सकता , जो वे चाह रहे हैं वही हो रहा है ? या उन्हीं की कु-मंशा सफलता की डगर पर है। हमारे देश में  कौन कर रहा है ऐसा ? गलती हो रही है।  राजनीतिक प्रतिद्वंद्वता के चलते हम खुद ऐसी गलती किये जा रहे हैं।  एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए हम खुद अपने देश की रीढ़ पर प्रहार कर रहे हैं। क्या इस प्रश्न पर ध्यान नहीं दिया जा सकता था कि अगर सारे दल एक साथ आतंकवाद या देश विरोधी गतिविधियों पर खड़े हो जाते और सरकार का हाथ मजबूत करते तो क्या हो जाता ? क्या जनता के सामने वे छोटे हो जाते या चुनाव के वक्त उनकी पराजय निश्चित हो जाती ? वोट बैंक की खातिर पार्टियां अपने अस्तित्व को ही उधेड़ती चली जा रही हैं और उन्हें यह ज्ञात ही नहीं हो रहा है कि जनता सबकुछ देख-समझ रही है कि आखिर चल क्या रहा है ? फिर चाहे कोई जेएनयू जाकर खुद को मसीहा दर्शाए या कोई हैदराबाद जाकर आंसू बहाए या कोई दादरी जाकर रोना रोये।  जनता समझती है कि ये सारे मगरमच्छी आंसू तब नहीं निकलते जब देश की सेना का कोई जवान शहीद होता है। और उस पर मीडिया के कुकर्म भी देखिये जो फिजां की खराबी के लिए उत्तरदायी है।  अपनी टीआरपी के चक्कर  में, तो अपने पक्षपात के फेरे में वो उन तमाम घटनाओं पर नमक मिर्ची लगाकर पेश करता है , उस पर डिबेट कराता है जिससे उनका ध्येय सिद्ध हो और वो जैसा विचार थोपना चाहते हैं अंततः थोप देते हैं। यह कड़वा सच है।  ऐसे माहौल में कड़वा कड़वा सब स्पष्ट ऊपर की ओर तैरने लगता है और यह ऊपर  उठे फैन को निकाल कर बाहर जनता को ही करना है ताकि इस कड़वे के नीचे छिपे सच के सुख का सबको लाभ हो सके।
protestगंभीरता से परखने की आवश्यकता है।  कोई भी व्यक्ति अगर देशहित की आवाज को बुलंद करे और अपनी बात रखे तो उसे भारतीय जनता पार्टी या संघ से जोड़ कर ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे उसने कोई गलती कर दी हो। फिर अगर वो कोई वार्ता करता है तो उसे यह कह कर चुप कराया जाता कि हमें तुमसे कोई सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। यह फैशन हो चला है आज की बहसों का। यानी राजनीतिक स्वार्थो , वोटबैंक के लिए हमने अपने देश को एक ओर सरका दिया है और हम अपने अपने विचार एक दूसरे पर सिर्फ थोपना ही नहीं बल्कि उसके अनुसार ही उसे चलता हुआ देखना चाहते हैं। चिढ है मोदी सरकार पर।  उतारी जा रही है जनता पर।  ताकि जनता मोदी सरकार के खिलाफ हो जाए और जो सत्ताच्युत हुए हैं वे पुनः सत्तासीन हो सकें। एक गिरी हुई मानसिकता , एक गिरी हुई राजनीति।  हर दल यही कर रहा है।  देश की ऐसी स्थिति शायद ही कभी आई हो जब किसी सरकार को प्रत्येक राजनीतिक दल अछूत मानकर उसके प्रत्येक फैसले का विरोध करे और वह सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि कहीं जनता में ये सरकार अपना प्रभाव न जमा ले।  आप देखिये मोदी सरकार का ऐसा कोई भी निर्णय अब तक किसी भी विपक्षी दल ने स्वीकार्य नहीं किया जो देश की जनता के हितार्थ लिया गया है।  क्यों ? उसमे मीन-मेख निकालकर ऐसा  प्रस्तुत किया जाने लगता या उस  पर रोढ़े अटकाए जाते हैं मानो वो पूरी तरह बेकार हैं ताकि जनता को पूरा पूरा लाभ न मिल जाए।  सच भी है यदि सबकुछ अच्छा हो जाएगा तो फिर उनका क्या होगा जो सत्ता से दूर हैं ?  ढेर सारे संकटो से , ढेर सारे व्यवधानों के बावजूद निरंतर मोदी सरकार जनता के हितार्थ अपनी सोच-अपने फैसले लेते जा रही है।  और क्या ये सबकुछ देश की जनता नहीं जानती -समझती ? निजी रोष , निजी स्वार्थ , निजी दुश्मनियाँ निकाल निकाल महज दो वर्ष के अंदर ही विपक्ष और मीडिया ने इस सरकार को ऐसा प्रस्तुत करने का काम किया है कि सबकुछ आज ही क्यों नहीं हुआ ? क्यों देर लग रही है ? और ये सब जब ६० साल जिस पार्टी का शासन रहा वो करती नजर आती है तो ताज्जुब होता है। ताज्जुब होता है ऐसी पार्टियों के विरोध का जो अभी अभी पैदा हुई है।  उनका तो मानो एकसूत्रीय काम हो गया है कि सरकार का विरोध करें , करते रहें।  इस देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि किसी सरकार को काबिज हुए महज डेढ़ साल पूरे हुए हैं , जो अपने दूसरे वर्ष में ही है उसके खिलाफ पूरी ताकत से सारी की सारी पार्टियां लामबंद है और  सबकोई उसे बदनाम करने का कोई अवसर नहीं चूक रही।  ये सब क्या चल रहा है , क्या जनता को दिखाई नहीं दे रहा  है ? और अगर दिखाई नहीं दे रहा है तो यकीनन देश का उद्धार संभव नहीं। आखिर क्यों किसी राजनीतिक दल में देश की जनता द्वारा चुनी गयी  सरकार को अपना कार्यकाल पूर्ण होने देने  का भी धैर्य नहीं? और हास्यास्पद तो यह भी है कि क्या कोई राजनीतिक पार्टी  ऐसा करके उसे गिरा सकटी है ? कम से कम पांच साल तो कोई उसे गिरा नहीं सकता तो क्यों नहीं उसे अपना काम करने दिया जाता ? क्यों नहीं उसके देश हितार्थ फैसलों में अपना योगदान दिया जाता ?क्यों महज ऐसे मुद्दों को हवा देकर फिजां को खराब करने की कोशिश की जाती है जिससे देश विकास के कार्यों पर आघात हो।  क्या देश के सामने आवश्यक मुद्दे ख़त्म हो गए हैं ? या कि विपक्ष की तमाम राजनीतिक पार्टियों के पास ऐसा कोई जनहितार्थ मुद्दा शेष ही नहीं रहा जिससे वो सरकार को घेर सके ?  फिर क्यों वो हर दिन जातीय -धर्म मुद्दे पर सरकार को घेरने और बवाल मचाने के लिए कूद पड़ती है ? गंभीरता से सोचिये।
भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा क्या है ? क्या देश को तोड़ने या बांटने की है ? नहीं।  वह अन्य पार्टियों से अलग हो सकती है किन्तु देश को बांटने  जैसी होती तो देश का क़ानून उसे ऐसा करने या उसे आगे बढ़ने ही नहीं देता।  सबके अपने विचार होते हैं , लोकतंत्र में ये विविधता ही जनता के  विकास मार्ग को प्रशस्त करती है। जो भी सरकार होगी , वह अपने विचार और अपनी तरह से काम करेगी।  उसे विपक्ष का कोई सुझाव भाएगा तो वह उसे स्वीकार करेगी किन्तु देश के खिलाफ  कोई काम कोई सरकार नहीं करती और न ही कर सकती है।  उसे अपनी तरह से कार्य करने और उसमे कामयाब होने के लिए संविधान ने पांच वर्ष दे रखे हैं।  कम से कम उसे पूरा करने दिया जाना चाहिए।  क्योंकि वो कितनी कामयाब हुई है या नहीं हुयी है , यह फैसला जनता पांच वर्ष बाद ले ही लेती है।  इसलिए आवश्यक है जनता की मूलभूत जरूरतों को मुद्दा बनाकर विरोधी पार्टियां अपना काम करे तो देश हितार्थ होगा न कि किसी सरकार को बदनाम करने, उसे अछूत बना देने या उसे समाज को बांटने वाला साबित करने जैसा कुकृत्य करके कमजोर करने के।
जितने विवाद तूल  पकड़ रहे हैं , ये सब देश के लिए अच्छे नहीं है।  जितने विवादों को तूल देकर काम किया जा रहा है , ये सब देश के लिए उचित नहीं है।  और जिस गंदी मानसिकता या नीयत रखकर राजनीतिक दल आपस में बैर रखे हुए हैं यह उनके लिए भी और देश के लिए  तो और भी घातक है। इसलिए समस्या सुलझाई जानी चाहिए , न कि  उसे बढ़ाकर किसी सरकार या किसी दल को नीचा दिखाने के।  संसद में बजट सत्र का प्रारम्भ होने वाला है , जैसी स्थितियां हैं उसे देखकर कोई भी यह अंदाज़ा लगा सकता है कि सत्र सफलतापूर्वक नहीं चल पायेगा।  और जब वो नहीं चलेगा तो देश कितना पीछे छूटता  जाएगा  क्या कोई इसे समझने का वक्त निकालेगा ? जरुरत है कि देशभक्ति की अगर बात सीना ठोंक कर करते हो तो संसद भी सुचारू रूप से चले और देश हितार्थ बिल भी पास हो। जनता सबकुछ समझ सकती है , यह विश्वास अब राजनीतिक दलों को हो जाना चाहिए।

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3 comments

  1. J.N.U के शिक्षक और विद्यार्थी ने हड़ताल इस बात पर नहीं की के J.N.U के अंदर भारत के खिलाफ बात हो रही थी और न ही इस बात पर के वहां भारत के टुकड़े – टुकड़े करने की बात हो रही थी…..
    हड़ताल और होहल्ला एक देश द्रोही को छुड़ाने के लिए हो रहा है भारत विरोधी नारे लगाने वाले लडके-लडकियों के परिवार वालों में तो थोडी बहुत शर्म हया और नमकहलाली बाकी होगी ? यदि नही है या सो गई है तो उनका बहिष्कार ही सबसे उम्दा तरीका है उन्हे और उनकी औलाद को सुधारने का . कृपया आजमाएं.

    • ​ बिलकुल सही है। दरअसल यह सब सोची समझी साजिश के तहत हो रहा है। परिवार कितना देश हित को ध्यान ​में रखकर अपनी बात करता है यह देखना है , वैसे उमर खालिद के पिता द्वारा जो कथन आया उससे स्पष्ट हो जाता है कि उनकी सोच कोई नई नहीं है बल्कि घर से जवान हुई है।

      • इन लोगों को जब भी कोई गलत काम करते हुए आप पकड़ लेते हैं तो यह एक ही रोना रोते हैं कि हम मुसलिम कोण से है इस लिये हम पर अत्याचार हो रहा है
        “कोई पूछे कि तुम गलत काम करते ही क्यों हो ”
        और काँग्रेस आपनी राजनीति की रोटियाँ सेकने का जाती है

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