Saturday, October 21, 2017
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नई कविताओं के नरेंद्र 

– संगीता पांडेय 
आधुनिक काल में हिन्दी कविता बड़ी तीव्र  गति के साथ परिवर्तन -शील रही है। छायावाद के बाद तो यह परिवर्तन क्रम और भी द्रुत गति से चला है। छायावादी कवि अपने चारो ओर कटु वास्तविकताओं की उपेक्षा करते रहे। फलस्वरूप कविवर दिनकर की शब्दावली में ”समकालीन सत्य से कविता का वियोग हो गया है”  इस वियोगावस्था को समाप्त करने का सर्वप्रथम प्रयास व्यक्तिवादी कवियों में हरिवंश राय बच्चन ,नरेन्द शर्मा जैसे कवियों ने किया। ये दोनों ही कवि लोकप्रियता में एक समान रहे। पण्डित नरेन्द शर्मा हिन्दी के लेखक ,कवि ,तथा गीतकार थे। नरेन्द शर्मा ने कवि के रूप में जितनी तन्मयता से प्रेमी मानस के हर्ष -विषाद को वाणी दी है उतने ही आक्रोश और सच्चाई से उन्होंने विशाल जनमानस के विवशता विद्रोह भावना और निर्माण की चेतना को मुखरित किया। नरेन्द शर्मा एक भावुक कवि थे। इनका जन्म २८ फरवरी १९१३ को उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर जिले के जहागीरपुर (गौतमबुद्धनगर) नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम श्री पूरनमल शर्मा तथा माता का नाम श्रीमती गायत्री देवी था। नरेन्द जी जब चार वर्ष के थे तभी उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। उन्होंने सन १९३६ में प्रयाग विश्वविद्यालय में एम  ए की परीक्षा उत्तीर्ण की उसके पश्चात उन्होंने लीडर प्रेस से प्रकाशित होने वाले ”भारत ”में कुछ दिन सहकारी संपादक के रूप में कार्य किया। सन १९३८ से १९४० तक उन्होंने अखिल भारती कांग्रेस कमेटी के कार्यालय में कार्य किया। यहाँ वे पण्डित जवाहर लाल नेहरू के निजी सहायक के रूप में रहे। सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उन्हें  दो वर्ष तक जेल में रहना पड़ा। कुछ दिन उन्होंने काशी विद्या पीठ में अध्यापन कार्य भी किया।

नरेन्द शर्मा का नई कविता में प्रमुख स्थान है। १९३१ में इनकी पहली कविता ”चाँद ”में छपी थी और १९३३ में इनकी पहली कहानी प्रयाग के ”दैनिक भारत ”में प्रकाशित हुई इसके बाद १९३४ में शर्मा जी ने मैथिलीशरण गुप्त की काव्य कृति ”यशोधरा” की समीक्षा भी लिखी। इसी समय आपने अभ्युदय पत्रिका का संपादन भी किया।

नरेन्द्र शर्मा ने साहित्य और लोकमंच कवि सम्मेलनों के माध्यम से जीवन को प्रभावित एवं प्रेरित कर साहित्यकार के दायित्व का निर्वाह किया। नरेन्द शर्मा का काव्य विकास पंत जी के समान प्रेम और प्रकृति के प्रगति के उपरान्त गांधीवाद और प्रगतिवाद  को दर्शाता हुआ दर्शन और चिन्तन के क्षेत्र में पहुचता है। नरेन्द शर्मा का काव्य हमे नयेपन की सूचना देता है। उनकी रचनाओं का प्रथम उल्लेख प्रभातफेरी (१९३८) में प्रकाशित हुआ। इससे पहले दो काव्यसंग्रह शूल फूल (१९३४) और कर्ण फूल (१९३६) में प्रकाशित हो चुके थे। नरेन्द शर्मा ने अनेक काव्यग्रन्थो की रचना की है। उनमें से कुछ प्रमुख काव्यकृतियॉ इसप्रकार है। पलाशवन (१९४०) इसमें प्रकृति के चित्र है तथा कुछ कविताएँ यथार्थवादी चेतना से भी संपृक्त है।

मिट्टी के फूल (१९४२) रामविलास शर्मा ने नरेन्द शर्मा की इस कृति को काव्य विकास की दृष्टि से एक  महत्वपूर्ण कृति माना है।

ग्राम्य -यह भी नरेन्द शर्मा की एक महत्वपूर्ण कृति है इसके बारे में रामविलास शर्मा लिखते है की ” नरेन्द शर्मा ने लोकगीत का स्वर साधने में सबसे  ज्यादा सफलता प्राप्त की है। ” इसके अतिरिक्त हंसमाला (१९४७ ) रक्तचन्दन (१९४८) अग्रिश्स्य (१९५०) कदलीवन (१९५३) उत्तरऱजत (१९६५) इनके काव्यसंग्रह है।  द्रोपदी (१९६४) में प्रकाशित इनका खण्डकाव्य है।

ऑलइंडिया रेडियो में शर्मा जी ने  कार्यक्रम नियोजक के रूप में भी काम किया इसके बाद विविध भारती के चीफ़ प्रोड्यूसर भी रहे।

नरेन्द शर्मा एक गीतकार के रूप में फिल्म में आये और थोड़े ही समय में सफल गीतकार बन गये ,उनकी कुछ अत्यंत लोकप्रिय गीत है। ”मन मोर हुआ मतवाला ”  नैन दीवाने ” ”ज्योति कलश छलके ” है।

नरेन्द शर्मा ने लगभग ५५ फिल्मों में ६५० गीत लिखे। इसके साथ ही  उन्होंने महाभारत की पटकथा और गीत की भी रचना की। नरेन्द जी के जीवन को एक पंक्ति में समेट  कर यदि कोई लिखना चाहे तो उसे उनके ही लिखे महाभारत के दोहे में देखा जा सकता है कि ”शंखनाद ने कर दिया ,समारोह का अंत,  अंत यही ले जाएगा ,कुरुक्षेत्र पर्यन्त”।   76 वर्ष की अवस्था में ११ फरवरी 1989 को हृदय गति रुक जाने के कारण इनका स्वर्गवास मुंबई में हो गया।

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