Thursday, November 23, 2017
अभी अभी

नया संवाद सेतु

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-डॉ. गरिमा संजय दुबे


अभीअभी रोज प्रसारित होने वाले धारावाहिकों  के नकारात्मक प्रभाव पर लेख को पढ़ कर बैठी ही थी सोच रही थी कि क्या सारे प्रभाव नकारात्मक ही होते है ? तभी  सखी पड़ोसन को बड़ी बैचेनी से इधर उधर टहलते हुए देखा तो सौजन्य  वश बाहर  आकर पूछ बैठी- “भई क्या बात है कोई समस्या आन पड़ी जो इतनी परेशान  नज़र आ रही हो ? वह थोड़ी सकपकाई और खिसियानी हँसी हँस कर बोली- “अरे नहीं कोई चिंता नहीं बस यूँ ही” | मैंने भी अपनी स्त्री सुलभ उत्सुकता को और हवा दी- “नहीं चिंता  की लकीरें साफ़ नजर आ रही है मुझे बता सकती हो”| वह खिसियाई हँसी में बोली- “आप को मेरी बात अजीब जरूर लगेगी पर क्या है ना आदत सी हो गयी है , टी. वी. देखने की एक भी एपिसोड छुट जाए तो लगता है बड़ा नुकसान हो गया , अब कल की ही बात लीजिये मेरा पसंदीदा सीरियल छुट गया, शादी में गयी थी इसलिए, सोचा था कोई बात नहीं रिपीट टेलीकास्ट देख लुंगी पर हाय री मेरी किस्मत देखो लाइट ही नहीं है, आज तो बड़ा खुलासा होने वाला था अब मुझे कैसे पता चलेगा |” मैंने उसके इस महान दुःख के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि “अपनी किसी सहेली, जान पहचान वालों से पूछ लो” | वह मायुस हो कर बोली- “कुछ करीबी लोगो से ही पूछ सकती हूँ पर हर कोई कही बीज़ी था और अभी सब ऑफिस गए है , नेट है नहीं अब तो यह एपिसोड गया ही समझो” | वह उदास स्वर में बोली |  अब अगर पडोसी परेशान हो तो पडोसी ही काम आता है ना अपना पडोसी धर्म निभाते हुए मैं उसकी समस्या का समाधान खोजने लगी आज मुझे अपने आप पर बड़ा गुस्सा आ रहा था , जो मै सीरियल  देखती होती तो एक जरूरतमंद की मदद कर देती , यह भी तो एक तरह की समाज सेवा ही है ना | पर फिर अचानक मेरे प्रयास रंग लाये मैंने ख़ुशी से लगभग उछलते हुए कहा- “लो बोलो घर में छोरा गली में डीन्डोरा, अरे अपनी सास से क्यों नहीं पूछती वह तो बड़े चाव से सीरियल  देखती है” | मेरी इस बात पर उसका चेहरा पल भर को खिला फिर बुझ गया-  “अब आप तो जानती है ना सास बहु का रिश्ता” | मै मन ही मन मुस्कुराई दिन रात सास ver-la-tele-300x270बहु के सीरियल देखती है और संवाद में कोताही |  मैंने कहा- “कोशिश कर के तो देख लो शायद तुम्हारे मन को शांति मिल जाए” | वह मुझसे उम्मीद उधार ले घर के अंदर पहुंची | मेरी खिड़की उनकी बैठक से लगी हुई थी सब दिखाई और सुनाई देता था  सो किताब ले कर मै भी वहीँ बैठ गयी , किसी  थ्रीलर सी  उत्सुकता मुझे उन दोनों सास बहु के संवाद को सुनने को मजबूर  कर  रही थी | बड़े बहाने से मेथी की दो गुडी  ले बहु जा कर सास के पास बैठ गयी , सास ने भी बड़े आश्चर्य से उसकी तरफ देखा और टी. वी. देखने लगी , जानती थी बहु का कल का एपिसोड छुट गया है मन ही मन मुस्कुरा रही थी | मेथी तोड़ते तोड़ते बहु ने बात शुरू की- “मम्मी  ये है मोहब्बतें देखा था क्या  कल”| सास ने मेथी की डंडी उठाते हुए कहा- “हां देखा था” | “क्या हुआ था ” बहु उत्सुकता में आगे खसक गयी | उसके साथ साथ मै भी  अनजाने ही अपनी कुर्सी पर  आगे झुक गयी | “वो जो उसकी पहली बहु थी न उसका भन्डा फूट गया ”, सास बोली |  अच्छा तब तो सास को पता चल गया होगा कि दूसरी बहु कितनी अच्छी है”  बहु ने चहकते हुए बहु बिरादरी का पक्ष लिया | “हां और बहु को भी पता चल गया  कि सांस भी उसकी मददगार ही है, दुश्मन नहीं .भाई बड़े कुछ  बोले तो भलाई के लिए ही बोलते है ना”  सांस ने अर्थ पूर्ण ढंग से अपना पक्ष रखा  कहे  | फिर आराम से बैठ दोनों कोई सास बहु वाला सीरियल देखने लगी , जिस सीन में बहु को बुरा बताते बड़ी ही चतुराई से सांस एक तीर से दो निशाने साध- “आजकल तो बहुओं का कोई ठिकाना ही नहीं है” कह कर कनखियों से बहु को देखती | बहु कहाँ मानने वाली थी सीरियल की सांस का सहारा ले- “सास शक्कर की हो तो भी टक्कर देती ही है” कह कर नहले पे देहला मारती “| उन दोनों के वार्तालाप से मुझे अरस्तू की कथारसिस थ्योरी  का ध्यान आ गया | अपनी ही तरह सांस बहु की खटर पटर को देख उनके दबे हुए उदगार एक दुसरे के प्रति हलके हो हो कर निकल रहे थे, और एक दुसरे को सूना सूना कर किये जाने वाले  मनोरंजक तंज,  कड़वी भावनाओं का विरेचन साबित हो रहे थे | ज़हर ज़हर को काटता है,  गणित में पढ़ा था कि माइनस माइनस प्लस होता है , यहाँ वह सिद्धांत सही होता दिख रहा था | सेरियल देखते देखते संवाद का एक सेतु बन गया था | तभी दोनों ने किसी सीन पर मेरी खिड़की की तरफ देखते हुए तंज कसा कि- “भाई पडोसी भी मजे लेने में लगे रहते है” और दोनों खिलखिला कर हँस  पड़ी और मैंने वहां से खसक लेने में ही अपनी भलाई समझी |

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