Wednesday, December 13, 2017
अभी अभी

भोंपुओं के बीच

अजय भट्टाचार्य (वरिष्ठ पत्रकार)

अजय भट्टाचार्य
(वरिष्ठ पत्रकार)

डंडापकड़पत्रकारिता इन दिनों दो ध्रुवों मे विभाजित हो गयी है। अाप चैनल बदलते जाइए और अनुभव करते जाइए। पिछले दिनों देश के प्रधानमंत्री ने एक निजी क्षेत्र के चैनल को प्रधानमंत्री बनने के २६ महीने बाद पहला इंटरव्यू दिया। जबकि सरकार के पास अपना स्वयं का दूरचित्रवाणी माध्यम दूरदर्शन है। जिसकी पहुंच देश भर के तमाम चैनलों से कहीं ज्यादा है। फिर भी प्रधानमंत्री ने उस चैनल को चुना जिससे संबंधित प्रकाशन संस्थान के अंग्रेजी अखबार के देश भर मे दो दर्जन से अधिक संस्करण प्रकाशित होते हैं। अन्य भाषाओं के भी कुछ संस्करण भी हैं। जाहिर है अगले दिन उस प्रकाशन समूह के सभी अखबारों मे प्रधानमंत्रीजी छाए हुए थे। इतना लाभ दूरदर्शन को इंटरव्यू देकर शायद नहीं मिलता। वैसे जब से भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार केंद्र मे पदासीन हुई है तब से ही चैनली पत्रकारिता का चरित्र बदला हो ऐसा नहीं है। याद कीजिए राष्ट्रमंडल खेल घोटाले से लेकर कोलगेट घोटाला और टू-जी अावंटन घोटाला तक, चैनली खोजबीन नेताओं के बयानों के अास-पास ही घूमती रहती थी। भाजपा के पीएम इन वेटिंग माननीय लालकृष्ण अाडवाणी संसद से लेकर सड़क तक इस यूपीए सरकार से संबद्ध घोटालों / भ्रष्टाचार के मामलों को उठाते रहे पर चैनली पत्रकार जगत तटस्थ भावगत भूमिका मे रहा। जैसे ये घोटाले कोई सामान्य घटना मात्र हों। भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा की अावाज कब उठी और कब नक्कारखाने मे तूती की तरह गूंजकर शांत हो गयी, पता ही न चला।

Only God's Word, Not Man's

यूपीए-२ सरकार के दो साल बीत जाने के बाद भी भ्रष्टाचार के खिलाफ विपक्ष वह माहौल नहीं बना पाया जो एक चुनी हुई सरकार को हिला सके। तब देश के कुछ स्वनामधन्य लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) के बैनरतले इकट्ठे हुए और जनलोकपाल के बहाने दिल्ली सहित देश भर मे छा गए। चैनली मंडली उनमे क्रांतिकारी देखने लगी। प्रिंट मीडिया भी इस ऐंद्रजालिक सम्मोहन से न बच सका। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई मे वे सब भी कूद पड़े जिनके अपने दामन भी पाक-साफ नहीं थे। क्या यह सब यूँ ही अचानक हो रहा था ? कतई नहीं। इंटरव्यू का कौन सा हिस्सा दिखाना था/है , कौन सा नहीं सब कुछ किसी से छिपा नहीं है। फिर यह सवाल सहज ही उठता है और उठना भी चाहिए कि चैनली अवतार सहित मीडिया अपने हर रूप मे बिक चुका था या इस बात के लिए प्रतिबद्ध था कि सत्ता प्रतिष्ठान की साख ज्यादा से ज्यादा धूमिल हो। मीडिया मे पैसे कौन भर रहा था यह अलग विषय हो सकता है। जब इसकी परतें उघड़ेंगी तो दुम के नीचे सब मादा नजर अाएंगे। राजग सरकार बनने के बाद मीडिया का चरित्र बदला। बदलने के कारण भी स्पष्ट हैं। सरकार ने पहले दिन से ही विज्ञापनी रेवड़ियां बांटनी शुरू कर दीं। समर्थकों ने भी अपने व्यापारिक संस्थानों के माध्यम से मीडिया को साधना शुरू कर दिया। नतीजा यह है कि कई अलोकप्रिय नीतियों, कर प्रावधानों के बावजूद सम्मति भरा मौन कायम है। दल/राज्य विशेष को लक्षित कर रामराज्य और जंगलराज्य की परिभाषा तय करने / थोपने मे चैनली पत्रकारिता ने अपनी सारी उर्जा झोंक दी। अात्महत्या करते किसान दिखना बंद हो गया। महंगी दाल-रोटी सब्जी संज्ञान से बाहर हो गयी। बढ़ता रेल भाड़ा नजर से दूर हो गया।
अब ताजा घटनाक्रम मे पत्रकार से नेता बने एम जे अकबर को लेकर चिट्ठियां उछल रही हैं। सवाल-जवाब चल रहा है। सहमति-असहमति है लेकिन इन सबके बीच पत्रकार पता नहीं कहां को गया है जो सर्वहारा की अावाज हुअा करता था। जिसे गरीब बड़ी उम्मीद रखता था कि वह उसकी अावाज सुनेगा और सुनाएगा। अब पत्रकार जो कर रहा है उसे यदि कोई दलाली कहता है , वेश्यावृत्ति कहता है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है।

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