Wednesday, December 13, 2017
अभी अभी

व्यक्त-अव्यक्त

रंग और ब्रश की दुनिया एक अलग ही दुनिया होती है। जहां न्यारी-न्यारी जिंदगियां सांस लेती हैं। जिनकी अपनी-अपनी भाषाएं हैं। अपने-अपने पहनावे हैं। इनकी भाषाएं कभी आपकी समझ में आ जाती हैं और कभी नहीं। लेकिन भाषाएं होती बहुत सुंदर हैं। बिल्कुल माँ बोली की तरह मन मोहती हुईं। और आप एक अलग ही संसार में चले जाते हैं और उन जिंदगियों के साथ बहते रहते हैं,  उनके साथ डुबकी लगाते रहते हैं और कमाल देखिए कि इस कर्म से आपकी सांसे नहीं फूलतीं। बस उस भाषा का दिव्य स्वाद लेती रहती हैं। ऐसी ही एक दुनिया ‘विजेंद्र विज’ और ‘अमित कल्ला’ ने ललित कला अकादमी में 1 सितम्बर से लेकर 7 सितम्बर तक बसाई थी।  इन छोटी-छोटी झलकियों से उस दुनिया का रस लीजिए।

अमित कल्ला

अमित कल्ला

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विजेंद्र विज

 

 

 

 

 

 

 

अमित कल्ला

अमित कल्ला

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विजेंद्र विज

विजेंद्र विज

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बरसों से बंद पड़े
मेरे दस्तावेजों की दुनिया
बड़ी ही दिलकश है
एक उम्र का अनुभव है
इनमें…
एक अर्थहीन पीड़ा
यहाँ,
पन्नों में साँस लेती है…
कितनी ही स्मृतियों के
बीज बोये है मैंने
इनके आंगन में…
मेरी अपनी जमीन है यहाँ
एक भाषा..
जहाँ…
प्रेम, स्वप्न और प्रार्थना का जिद्दीपन है
जो अभी-अभी इतिहास हुआ लगता है…
हाँ,
व्यथा है…
मेरे इन दस्तावेजों में
एक अ-नायक की…
जिसे…
अपने ही घर की तलाश है…
-विजेंद्र विज

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अमित कल्ला

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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विजेंद्र विज

 

 

 

 

 

 

अमित कल्ला

अमित कल्ला

 

 

 

 

 

 

 

 

 

विजेंद्र विज

विजेंद्र विज

 

 

 

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