Thursday, November 23, 2017
अभी अभी

क़ानून भी बन जाए तो क्या ?

राजेश दुबे

राजेश दुबे

निर्भयाको याद करके बहुत लोगों का दिल सचमुच दुखा और बहुत से लोगों ने घड़ियाली आंसू भी बहा लिए. कुछ अति- समझदारों की नज़र में ये ज़िम्मेदारी सिर्फ दिल्ली सरकार की थी और देश में केंद्र सरकार की तो कोई ज़िम्मेदारी है ही नहीं, इसलिए यही मान लेते हैं कि दिल्ली सरकार की नींद उस दरिंदे क़ातिल की रिहाई आने पर खुली और ये बात जितनी सच है उतना ही सच ये भी है कि उस पर ज्ञान बांटने वाले हम जैसे ज्ञानचंदों की नींद भी अभी ही खुली है. सबने अपना अपना कानूनी ज्ञान भी बघार लिया और कुछ फ्रस्ट्रेटेड मूर्खों ने कानून का अपनी मनमर्जी से कचूमर निकालते हुए उस क्रूर हत्यारे को आर्थिक सहायता देने को संविधान की व्यवस्था के बजाय केजरीवाल के पर्सनल इंटरेस्ट की तरह एस्टेब्लिश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. दुर्भाग्य से सोशल मीडिया के अवांछित दुष्प्रचारियों की कुछ निहायत मूर्खों ने हौसला-अफ़ज़ाई भी खूब की.
nirbhyaलेकिन बात यहीं ख़त्म तो नहीं हो जायेगी. ना ये आखिर अपराध है और ना ये आखिरी अपराधी है. भविष्य में ऐसे अपराध और अपराधियों से हमारी बेटियों को कैसे बचाया जाए ये सोचने की शुरुआत अभी करनी ज़रूरी है. इस खौफनाक हादसे के बाद इस एक्ट में परिवर्तन की प्रोसेस तो शुरू हो चुकी है, लेकिन सिर्फ कानून बन जाने से भी कुछ नहीं होगा. अप्रैल 2015 में लोकसभा से पारित अमेंडमेंट बिल में ये प्रावधान है कि 16 वर्ष से बड़ी उम्र के अपराधियों को वयस्क अपराधी मानकर मुक़दमे चलाये जाएंगे. लेकिन अगर 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चे ऐसा ही कोई अपराध कर दिया तो बात तो वहीं आ जायेगी. ऐसा होने की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. ये ज़रूर है कि एक और प्रावधान प्रस्तावित है जिसके तहत विशेष परिस्थिति में किसी भी नाबालिग को छोड़ने या ना छोड़ने का निर्णय न्यायालय के विवेक पर छोड़ा गया है, मगर नाबालिग अपराधियों को छोड़े जाने के बाद Rehabilitation, re-integration and after care के प्रावधान अभी भी हैं. चाहे केजरीवाल सरकार हो या कोई और सरकार, Juvenile act 2000 के प्रावधान के अनुसार व्यवस्था थी- “बच्चों के विशेष या बाल घर छोड़ने पर तीन वर्ष या 21 वर्ष की आयु होने तक वित्तीय तथा आगे की सहायता दी जायेगी” जिसमें शाब्दिक हेर फेर करके प्रस्तावित अमेंडमेंट में कहा गया है- “18 वर्ष की आयु के बाद बाल देखभाल संस्था छोड़ने वाले बच्चों को एक मुश्त वित्तीय सहायता दी जायेगी”. यानी ईश्वर ना करे भविष्य में किसी प्रदेश में ऐसा हो तो उस प्रदेश की सरकार को बदनाम करने की व्यवस्था अभी भी है. मूल समस्या यहीं है. इस गंभीर और संवेदनशील विषय का राजनीतिकरण कर दिया गया है जिसने इसकी गंभीरता कम कर दी है.  लोग केंद्र सरकार और विपक्षी दलों को भी कोस रहे हैं जिनकी लापरवाही से अमेंडमेंट बिल अभी तक पास नहीं हो पाया है. कोई ये समझना ही नहीं चाहता कि वो बिल पास भी हो जाता तब भी निर्भया के मामले पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि कानून रेट्रोस्पेक्टिव तरीके से लागू नहीं होता है. इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बिंदु ये भी है कि कानून किसी घटना विशेष के आधार पर नहीं बनते हैं. कानून सभी अपराधों और अपराधियों को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं. इस एक अपराध पर हम गुस्से में कह सकते हैं कि इसे फांसी दी जानी चाहिए, लेकिन ह्त्या के कई ऐसे मामले भी होते हैं जिनमें फांसी जैसी कड़ी सज़ा से इन- जस्टिस हो सकता है. इसलिए प्रस्तावित बिल में कैपिटल पनिशमेंट और लाइफ इन्प्रिसनमेंट का प्रावधान नहीं रखा गया है. जुवेनाइल एक्ट में बहुत छोटी उम्र के बाल अपराधी भी होते हैं जिनके अपराध छोटी मोटी चोरी या अपराधियों के बहकावे में नशीले पदार्थ बेचने जैसे अपराध भी होते हैं. Rehabilitation, re-integration and after care का प्रावधान इसलिए इस एक्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा है. सिर्फ एक अपराधी की वजह से लाखों बच्चों को सुधार के रास्ते पर ले जाने के कानून के आशय के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है. इसलिए बच्चों को अपराध से दूर रखने से के लिए कानून पर निर्भर रहने के बजाय सामाजिक जागरूकता की ज़्यादा ज़रूरत है. हम अपने परिवार के बच्चों को ऐसी परवरिश देने की कोशिश करें कि वो महिलाओं का सम्मान करना सीखें तो मेरे ख्याल से बेहतर होगा. सुप्रीम कोर्ट में एक एनजीओ ने पीआईएल के माध्यम से एक अच्छा सुझाव दिया था कि स्कूली शिक्षा में नैतिक शिक्षा को विशेष महत्त्व देकर कम्पलसरी सब्जेक्ट बनाया जाए. दुर्भाग्य से उस सुझाव पर कोई निर्णय नहीं हो पाया. क्यों ना हम इस सुझाव को क्रियान्वित करने के लिए अपने स्तर कोशिश शुरू करें?
जुवेनाइल एक्ट के Rehabilitation, re-integration and after care प्रावधान संक्षिप्त में दे रहा हूँ. जो डिटेल पढ़ना चाहें उनके लिए प्रस्तावित एक्ट की लिंक भी अटैच है-
Chapter 1,
article 1 (i) apprehension, detention, prosecution, penalty or imprisonment, “REHABILITATION AND SOCIAL RE- INTEGRATION” of children in conflict with law;
article 2 (5) “aftercare” means making provision of support, financial or otherwise, to persons, who have completed the age of eighteen years but have not completed the age of twenty-one years, and have left any institutional care to join the mainstream of
the society;

Chapter VII
40.
(1) The process of rehabilitation and social integration of children under this Act shall be undertaken, based on the individual care plan of the child, preferably through family based care such as by restoration to family or guardian with or without supervision or sponsorship, or adoption or foster-care:
The rehabilitation and social reintegration of a child shall begin during the stay of the child in a children’s home or special home and the rehabilitation and social reintegration of children shall be carried out alternatively by (i) adoption, (ii) foster care, (iii) sponsorship, and (iv) sending the child to an after-care organization.
41.
(1) The restoration and protection of a child shall be the prime objective of any
children’s home, Specialized Adoption Agency or open shelter.

47.
Any child leaving a child care institution on completion of eighteen years of age may be provided with a one-time financial support in order to facilitate child’s reintegration into the mainstream of the society in the manner as may be prescribed.

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