Wednesday, December 13, 2017
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Category Archives: साहित्य रस

“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस”

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य दर्शन के 25 वर्ष ( 1992 -2017) “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” मानवता की कलात्मक हुंकार! – मंजुल भारद्वाज (रंग चिन्तक- “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” के सृजक और प्रयोगकर्ता) नब्बे का दशक देश,दुनिया और मानवता के लिए आमूल बदलाव का दौर है.”औद्योगिक क्रांति” के पहिये पर सवार होकर मानवता ने सामन्तवाद की दासता से निकलने का ख्वाब देखा.पर नब्बे के दशक तक ... Read More »

नई कविताओं के नरेंद्र 

– संगीता पांडेय  आधुनिक काल में हिन्दी कविता बड़ी तीव्र  गति के साथ परिवर्तन -शील रही है। छायावाद के बाद तो यह परिवर्तन क्रम और भी द्रुत गति से चला है। छायावादी कवि अपने चारो ओर कटु वास्तविकताओं की उपेक्षा करते रहे। फलस्वरूप कविवर दिनकर की शब्दावली में ”समकालीन सत्य से कविता का वियोग हो गया है”  इस वियोगावस्था को समाप्त करने ... Read More »

‘साहिर’ हर ज़हन में है

साहिर लुधियानवी एक ऐसा नाम जो शब्दों के अमृत सा युगो युगों तक बरसता रहेगा। उनकी जिंदगी और उनके कलाम अपने आप में अलहदा हैं।  उनकी रचनाओं में या उनके फ़िल्मी गीतों में छलकती है उनकी जिंदगी , उनकी मोहब्बत और उनकी वीरानी। आइये आज उनके कुछ कलाम को गुनगुनाते हैं।  मायूस तो  मायूस तो हूं वायदे से तेरे, कुछ ... Read More »

मिल गयी ”एंटीइनटॉलरेंस” दवा

व्यंग्य यात्रा- वार्मिंग ने जलवायु परिवर्तित कर दिया है  , इतना कि हमारे देश में अब कोई मौसम अपने सही समय पर आता ही नहीं।  आता है तो छप्पर फाड़ कर आ जाता है,  नहीं आता तो छप्पर तक सूख के भरभरा कर गिर जाती है। कहीं कही तो सर्दी और गरमी एक साथ हो जाती है कभी कभी ऐसा हो जाता ... Read More »

व्यक्त-अव्यक्त

ग और ब्रश की दुनिया एक अलग ही दुनिया होती है। जहां न्यारी-न्यारी जिंदगियां सांस लेती हैं। जिनकी अपनी-अपनी भाषाएं हैं। अपने-अपने पहनावे हैं। इनकी भाषाएं कभी आपकी समझ में आ जाती हैं और कभी नहीं। लेकिन भाषाएं होती बहुत सुंदर हैं। बिल्कुल माँ बोली की तरह मन मोहती हुईं। और आप एक अलग ही संसार में चले जाते हैं ... Read More »

‘तेरी आग की उम्र इन अक्षरो को लग जाये’

इक्क पत्थरां दा  नगर सी सूरज वंश दे पत्थर ते चंदर वंश दे पत्थर उस नगर विच्च रहन्दे सन ते कहन्दे हन- इक्क सी सिला ते इक्क सी पत्थर ते उहनां दा उस नगर विच्च संजोग लिखिया सी ते उहनां ने रल के इक्क वर्जत फल चखिया सी ओह खौरे चकमाक पत्थर सन जो पत्थरां दी सेज ते सुत्ते- तां ... Read More »

”पूछो परसाई से ”जन्मदिन विशेष

लेखन में व्यंग्य एक कसौटी है। गद्य की गंभीरता , उसकी सजीवता , उसकी शक्ति , उसकी क्षमता का निचोड़ व्यंग्य के जरिये प्रस्तुत कर पाना कोई सरल कार्य नहीं होता।  और जो सरल नहीं होता उसे अपने जीवन का मुख्य ध्येय बना लेना ही हरिशंकर परसाई हो जाना है।  पर यह हर किसी के बस की बात नहीं है और यही कारण ... Read More »

वृत्त-अनावृत

जयपुर ‘मूल फाउंडेशन’ परिसर मे रमता दृग और मूल के संयुक्त तत्वाधान में “वृत्त-अनावृत” शीर्षक के अंतर्गत एक गंभीर कला परिचर्चा का आयोजन किया गया, जिसमें पेंटिंग स्कल्पचर और फोटोग्राफी विधा के लगभग बीस कलाकारों ने परोक्ष रूप से इस कलावार्ता में अन्य कलाकारों,कला आलोचकों तथा सहृदयीयों के बीच अपनी कला यात्रा के विभिन्न पक्ष रखे। इसमें बड़ी संख्या में शहर के ... Read More »

मदनमोहन की पुण्यतिथि पर विशेष

को वक्त रहते न पहचान पाना संभव है हमें बाद में पश्चाताप की अग्नि में झोँक देता है। हम अपने किये पर न केवल शर्मिन्दा होते हैं बल्कि एक बेहतरीन हुनरमंद को उसका दर्जा न दे पाने वाले अपराधी भी बन जाते हैं। जिस दौर की यह बात है उस दौर में  यूं तो पूरा हिन्दुस्तान एक ऐसे ही हुनरमंद के  संगीत की ... Read More »

‘नागार्जुन’ जन्मदिन विशेष

आये दिन बहार के ‘स्वेत-स्याम-रतनार’ अंखियां निहार के सिंडकेटी प्रभुओं की पग-धूर झार के लौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार के खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के आये दिन बहार के! बन गया निजी काम दिलायेंगे और अन्य दान के, उधार के टल गए संकट, यूपी-बिहार के लौटे टिकट मार के आये दिन बहार के! सपने दिखे कार ... Read More »