Saturday, August 19, 2017
अभी अभी

Category Archives: कविता

‘तेरी आग की उम्र इन अक्षरो को लग जाये’

इक्क पत्थरां दा  नगर सी सूरज वंश दे पत्थर ते चंदर वंश दे पत्थर उस नगर विच्च रहन्दे सन ते कहन्दे हन- इक्क सी सिला ते इक्क सी पत्थर ते उहनां दा उस नगर विच्च संजोग लिखिया सी ते उहनां ने रल के इक्क वर्जत फल चखिया सी ओह खौरे चकमाक पत्थर सन जो पत्थरां दी सेज ते सुत्ते- तां ... Read More »

‘नागार्जुन’ जन्मदिन विशेष

आये दिन बहार के ‘स्वेत-स्याम-रतनार’ अंखियां निहार के सिंडकेटी प्रभुओं की पग-धूर झार के लौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार के खिले हैं दांत ज्यों दाने अनार के आये दिन बहार के! बन गया निजी काम दिलायेंगे और अन्य दान के, उधार के टल गए संकट, यूपी-बिहार के लौटे टिकट मार के आये दिन बहार के! सपने दिखे कार ... Read More »

एक मजदूर हूं

मैं भी इसी जीवन का दर्पण जरुर हूं अभी-अभी अंधियारा अभी-अभी नूर हूं। लहर-लहर सपनों के सागर में गीत हैं ठहर-ठहर, दुनिया! मैं नशे में चूर हूं। तुम भी इसी धरती के चांदी के फूल हो मैं भी इस धरती की मिट्टी का नूर हूं। जर्रा समझते हुए कुचलो ने मुझको मैं भी किसी दुखियारी मां का गुरुर हूं। जीवन ... Read More »

ओ मेरे भले दोस्त

ओ मेरे भले दोस्त, अच्छे दोस्त अब मैं अपना खाली समय गुजार नहीं सकूंगी तुम्हारे साथ किसी मां का भटका बेटा दोस्त बन गया अब मेरा । तुम्हारे पास महल है, दरबार है उसके पास जंगल और रेगिस्तान, तुम्हारे पास योद्धा हैं, सैनिक हैं उसके पास समुद्र की रेत । आज मैं समुद्र के पास टहल रही हूं उसके साथ ... Read More »

पत्र के बहाने से

तुम्हारा और बाबू जी का दोनों पत्र एक साथ पकड़ाया, डाकिया ने। पहले बाबूजी… एक बार बाँच कर सिरहाने की जगह उसके लिए माकूल पाया तुम्हारा पत्र जेब में भरकर निकल आया एक बहुत छाँहवाली पेड़ के नीचे जमकर बैठा, एक नुकीली-सी चट्टान पर। पेड़ की शाखें तुम्हारी बाँहें बन गई पत्तियाँ आँखें हाँ… पीछे से तुम भी झुक आओ ... Read More »

‘घर-घर माँ होली आई है’

घर-घर उड़ै हे गुलाल माँ होली आई चून्दड़ तो ले दे नुआ टाण माँ होली आई घर-घर उड़ै हे गुलाल माँ होली आई जम्फर तो ले दे नुआ टाण माँ होली आई घर-घर उड़ै हे गुलाल माँ होली आई मेहंदी तो ले दे रचणी लाल माँ होली आई घर-घर उड़ै हे गुलाल माँ होली आई सैण्डल तो ले दे नुआ ... Read More »

फागण के दिन चार री सजनी

फागण के दिन चार री सजनी, फागण के दिन चार मध जोबन आया फागण मैं फागण बी आया जोबन में झाल उठे सैं मेरे मन मैं जिनका बार न पार री सजनी, फागण के दिन चार। प्यार का चन्दन महकन लाग्या गात का जोबन लचकन लाग्या मस्ताना मन बहकन लाग्या प्यार करण नै तैयार री सजनी, फागण के दिन चार। ... Read More »

जिसको चाहो उसे आज वर लो

यह मिट्टी की चतुराई है रुप अलग औ रंग अलग भाव, विचार, तरंग अलग हैं ढाल अलग है ढंग अलग आजादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो! निकट हुए तो बनो निकटतर और निकटतम भी जाओ रुढ़ि-रीति के और नीति के शासन से मत घबराओ आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही ... Read More »

चलो फिर से मुस्कराएं

गीत चलो फिर से मुस्कराएं चलो फिर से दिल जलाएं जो गुजर गई हैं रातें उन्हें फिर जगा के लाएं जो बिसर गई हैं बातें उन्हें याद में बुलाएं चलो फिर से दिल लगाएं चलो फिर से दिल लगाएं चलो फिर से मुस्कुराएं किसी शह-नशीं * पे झलकी वो धनक किसी क़बा* की किसी रंग में कसमसाई वो कसक किसी ... Read More »

बाबुशा को मिला ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार

नई दिल्ली / युवा कवयित्री बाबुशा कोहली को ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार दिया गया है साथ ही युवा कथाकार उपासना को कहानी विधा के लिए उनकी पांडुलिपि ‘एक जिंदगी एक एक स्क्रिप्ट भर’ को भी पुरस्कार प्राप्त हुआ है . आपको बता दे कि युवा कवयित्री बाबुशा कोहली को कविता विधा के लिए उनकी पांडुलिपि ‘प्रेम गिलहरी दिल अखरोट’ को ... Read More »