Wednesday, December 13, 2017
अभी अभी

Category Archives: संस्मरण

नई कविताओं के नरेंद्र 

– संगीता पांडेय  आधुनिक काल में हिन्दी कविता बड़ी तीव्र  गति के साथ परिवर्तन -शील रही है। छायावाद के बाद तो यह परिवर्तन क्रम और भी द्रुत गति से चला है। छायावादी कवि अपने चारो ओर कटु वास्तविकताओं की उपेक्षा करते रहे। फलस्वरूप कविवर दिनकर की शब्दावली में ”समकालीन सत्य से कविता का वियोग हो गया है”  इस वियोगावस्था को समाप्त करने ... Read More »

‘साहिर’ हर ज़हन में है

साहिर लुधियानवी एक ऐसा नाम जो शब्दों के अमृत सा युगो युगों तक बरसता रहेगा। उनकी जिंदगी और उनके कलाम अपने आप में अलहदा हैं।  उनकी रचनाओं में या उनके फ़िल्मी गीतों में छलकती है उनकी जिंदगी , उनकी मोहब्बत और उनकी वीरानी। आइये आज उनके कुछ कलाम को गुनगुनाते हैं।  मायूस तो  मायूस तो हूं वायदे से तेरे, कुछ ... Read More »

”पूछो परसाई से ”जन्मदिन विशेष

लेखन में व्यंग्य एक कसौटी है। गद्य की गंभीरता , उसकी सजीवता , उसकी शक्ति , उसकी क्षमता का निचोड़ व्यंग्य के जरिये प्रस्तुत कर पाना कोई सरल कार्य नहीं होता।  और जो सरल नहीं होता उसे अपने जीवन का मुख्य ध्येय बना लेना ही हरिशंकर परसाई हो जाना है।  पर यह हर किसी के बस की बात नहीं है और यही कारण ... Read More »

शहीद भगत का एक ख़त

कुलतार के नाम अंतिम पत्र सेण्ट्रल जेल, लाहौर 3 मार्च, 1931 प्यारे कुलतार, आज तुम्हारी आंखों में आंसू देखकर बहुत दुख पहुंचा। आज तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था। तुम्हारे आंसू मुझसे सहन नहीं होते। बरखुरदार, हिम्मत से विधा प्राप्त करना और स्वास्थ्य का ध्यान रखना। हौसला रखना, और क्या कहूं- उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्ज़े-जफ़ा क्या है, ... Read More »

कहानी नाटककार सिद्धू की…

मनीराम मेरे पिता के मुताबिक, आठ चैत्र मंगलवार तड़के समाधि में से निकलकर बाबा महेशदास ने उसको चरणदास के आने की अडवांस इंफर्मेशन दी। जब बग्गा सिंह सिंह की माँ बुड्ढी दाई गुलाबो ने आप आकर खबर दी, तब मेरा पिता नीचे गहराई में कुआं खोद रहा था। उसके लफ़्ज़ों में, बार-बार दोहराए लफ़्ज़ों में, ‘उधर आठ चैत्र मंगलवार का ... Read More »

फक्कड़ सिद्धू

सिद्धू किसी का दास नहीं! चरणदास होना तो बहुत दूर की बात है। पता नहीं, मां-बाप ने उसका नाम क्या सोचकर रखा था। दास-भावना उसके नजदीक नहीं पहुंची। वह तो निरा फक्कर है। सीधा-सादा-सा, खुले स्वभाव वाला बंदा। बेपरवाह! गांव के डांगर-बछड़े चराता-चराता दिल्ली आ धमका। और यहां भी ऐसे चलता फिरता है जैसे कोई खोई हुई गाय हो। सिर ... Read More »

बूझो तो उसका नाम

देखो वह सांवला जोशीला पहने सादी पेंट और जिस पर सफेद कमीज आंखों पर पहने मोटा चश्मा पैरों में पहने कपड़े के जूते और कंधे पर डाले झोला वह कौन ? मस्त, मनमोहन चाल से चला जाता बूझो तो उसका नाम। लोग कहते कि वह कॉलेज में बच्चों को इंग्लिश पढ़ाता पर बच्चे कहते कि वह हमें जीवन जीना सिखाता ... Read More »

आज भी बोलता है डॉ सिद्धू का कमरा

नाटककार की दो दुनिया होती है। एक बाहर की और एक अंदर की। बाहर की दुनिया में आदमी लोक-लाज, समाज-व्यवहार इत्यादि में उलझा होता है किंतु अंदर की दुनिया यानी घर के उस खास कमरे की दुनिया अलहदा होती है। यहां आदमी सिर्फ खुद का होता है। खुद में जीता और खुद में हारता है। यहीं रचा जाता है वह ... Read More »

‘जोश’ वाले नेहरु

वह अपनी मोहिनी सूरत के आर्कषण, अपने रंग की चमक-दमक, अपनी आंखों की मुरव्वत, अपनी लहजे की कड़ाई, अपने उच्चारण के संगीत, अपनी मुस्कराहट की मृदुता, अपनी कुल-प्रतिष्ठा, अपने ह्र्दय की असीम विशालता, अपने स्वभाव की अद्वितीय शालीनता और अपने चरित्र की बेजोड़ दृढ़ता के एतबार से एक ऐसे इंसान थे जो इस धरती पर सदियों के बाद पैदा होते ... Read More »

उर्दू शायरी के मिजाज का मजाज़

मजाज़ उर्दू शायरी का कीट्स है। मजाज़ शराबी है। मजाज़ बड़ा रसिक और चुटकलेबाज है। मजाज़ के नाम पर गर्ल्स कॉलेज अलीगढ़ में लाटरियां डाली जाती थी कि मजाज़ किसके हिस्से में पड़ता है। उसकी कविताएं तकियों के नीचे छुपाकर आंसुओं से सींची जाती थीं और कंवारियों अपने भावी बेटों का नाम उसके नाम पर रखने की कसमें खाती थी। ... Read More »