Wednesday, December 13, 2017
अभी अभी

Tag Archives: कविता

एक मजदूर हूं

मैं भी इसी जीवन का दर्पण जरुर हूं अभी-अभी अंधियारा अभी-अभी नूर हूं। लहर-लहर सपनों के सागर में गीत हैं ठहर-ठहर, दुनिया! मैं नशे में चूर हूं। तुम भी इसी धरती के चांदी के फूल हो मैं भी इस धरती की मिट्टी का नूर हूं। जर्रा समझते हुए कुचलो ने मुझको मैं भी किसी दुखियारी मां का गुरुर हूं। जीवन ... Read More »

ओ मेरे भले दोस्त

ओ मेरे भले दोस्त, अच्छे दोस्त अब मैं अपना खाली समय गुजार नहीं सकूंगी तुम्हारे साथ किसी मां का भटका बेटा दोस्त बन गया अब मेरा । तुम्हारे पास महल है, दरबार है उसके पास जंगल और रेगिस्तान, तुम्हारे पास योद्धा हैं, सैनिक हैं उसके पास समुद्र की रेत । आज मैं समुद्र के पास टहल रही हूं उसके साथ ... Read More »

पत्र के बहाने से

तुम्हारा और बाबू जी का दोनों पत्र एक साथ पकड़ाया, डाकिया ने। पहले बाबूजी… एक बार बाँच कर सिरहाने की जगह उसके लिए माकूल पाया तुम्हारा पत्र जेब में भरकर निकल आया एक बहुत छाँहवाली पेड़ के नीचे जमकर बैठा, एक नुकीली-सी चट्टान पर। पेड़ की शाखें तुम्हारी बाँहें बन गई पत्तियाँ आँखें हाँ… पीछे से तुम भी झुक आओ ... Read More »

बूझो तो उसका नाम

देखो वह सांवला जोशीला पहने सादी पेंट और जिस पर सफेद कमीज आंखों पर पहने मोटा चश्मा पैरों में पहने कपड़े के जूते और कंधे पर डाले झोला वह कौन ? मस्त, मनमोहन चाल से चला जाता बूझो तो उसका नाम। लोग कहते कि वह कॉलेज में बच्चों को इंग्लिश पढ़ाता पर बच्चे कहते कि वह हमें जीवन जीना सिखाता ... Read More »

प्रेम का रोग

एक अजीब-सी मुश्किल में हूं इन दिनों मेरी भरपूर नफरत कर सकने की ताकत दिनोंदिन क्षीण पड़ती जा रही है। अग्रेंजो से नफरत करना चाहता ( जिन्होने दो सदी हम पर राज किया) तो शैक्सपीयर आड़े आ जाते जिनके मुझ पर न जाने कितने एहसान हैं। मुसलमानों से नफरत करने चलता तो सामने गालिब आकर खड़े हो जाते अब आप ... Read More »