Saturday, October 21, 2017
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Tag Archives: डॉ. अजीत

हमारी अधूरी कहानी: दिल से जीने का हौसला देती है

इस फिल्म को आधी-अधूरी कहानी के सहारे प्रेम की पवित्रता को कहने, समझने या दिखाने की एक कोशिस कहा जा सकता है. फिल्म कुछ-कुछ टुकड़ो में अच्छी लगती है तो कुछ जगह जाकर उलझी हुई लगने लगती है. फिल्म को लेकर मोहित सूरी खुद ही उलझे हुए लगते हैं. ऐसे में बतौर निर्देशक वो ठीक ढंग से बता नही पाये ... Read More »

दिल की धड़कनों का संगीत सुनाती फिल्म

दिल तो वैसे चौबीसों घंटे धड़कता ही रहता है। मगर निर्देशक जोया अख़्तर की यह फ़िल्म देखकर दिल की धड़कनों को गिनने का हुनर मिलता है, बशर्ते आप मुहब्बत और आजादी की बेचैनियों को जाननें के सच्चे तलबगार हो। यह फ़िल्म अभिजात्य/कुलीन वर्ग के लोगों की जिंदगी में पसरें खामोश सन्नाटे और रिश्तों के बुनावट की महीन पड़ताल करती है। ... Read More »

‘पीकू’ : भविष्य से बात करती एक संवेदनशील फ़िल्म

सिनेमाई दर्शकों का कस्बाई या शहरी चरित्र भलें ही फंतासी को अधिक पसन्द करता हो उसके लिए मनोरंजन का खालिस अर्थ एक्शन,थ्रिल,कॉमेडी हो मगर फिर भी पीकू जैसी संवेदनशील फ़िल्म का बनना इस बात का संकेत है कि भले ही जोखिम हो मगर आज भी सिनेमा के जरिए अर्थपूर्ण विषयों पर संवाद करने का हौसला कुछ निर्माता निर्देशक रखते है।’पीकू’ ... Read More »

धर्मसंकट में : इस दौर की एक बेहद जरूरी फ़िल्म

धर्म के नाम पर फैले अतिवाद और गलतफ़हमियों के कारोबार के बीच ‘ओह मॉय गॉड’,’पीके’ और अब ‘धर्मसंकट’ में जैसी फ़िल्म का आना एक सुखद बयार के आने के जैसा है। इस दौर में धर्म ने जिस तरह से बहुसंख्यक लोगों की सोच और विवेक पर कब्जा किया है उसनें बहुत से सवाल खड़े कर दिए है। मसलन इंसान का ... Read More »

एन एच 10 का सफर जो खत्म नहीं होता

हाईवे बड़े शहरों को आपस में जोड़तें हैं ऐसा कहते हैं सब मगर ये फ़िल्म हाईवे और महानगरों के बीच बसे देहात के बीहड़ और उसके टूटे बिखरे हुए समाजशास्त्रीय सच की कहानी हैं। टेबलॉयड और गूगल के सहारे हिन्दुस्तान को जानने के एक महानगरीय सांस्थानिक सच का बेहद अस्त व्यस्त कर देने वाला दस्तावेज है यह फ़िल्म। फ़िल्म रात ... Read More »