Wednesday, December 13, 2017
अभी अभी

Tag Archives: डॉ चरणदास सिद्धू

कहानी नाटककार सिद्धू की…

मनीराम मेरे पिता के मुताबिक, आठ चैत्र मंगलवार तड़के समाधि में से निकलकर बाबा महेशदास ने उसको चरणदास के आने की अडवांस इंफर्मेशन दी। जब बग्गा सिंह सिंह की माँ बुड्ढी दाई गुलाबो ने आप आकर खबर दी, तब मेरा पिता नीचे गहराई में कुआं खोद रहा था। उसके लफ़्ज़ों में, बार-बार दोहराए लफ़्ज़ों में, ‘उधर आठ चैत्र मंगलवार का ... Read More »

फक्कड़ सिद्धू

सिद्धू किसी का दास नहीं! चरणदास होना तो बहुत दूर की बात है। पता नहीं, मां-बाप ने उसका नाम क्या सोचकर रखा था। दास-भावना उसके नजदीक नहीं पहुंची। वह तो निरा फक्कर है। सीधा-सादा-सा, खुले स्वभाव वाला बंदा। बेपरवाह! गांव के डांगर-बछड़े चराता-चराता दिल्ली आ धमका। और यहां भी ऐसे चलता फिरता है जैसे कोई खोई हुई गाय हो। सिर ... Read More »

डायरी के पन्नों से झांकता जीवन

जीवन के साथ -साथ चलती है डायरी। जीवन के बाद भी जिंदा रहती है डायरी। और उसमें लिखे फलसफे जी गई एक पूरी जिंदगी को साधती है। अमर रखती है। ये डायरी है, उसके पन्ने हैं और पन्नो पे लिखी इबारतें हैं, जिसमें जीवन है …जीवन की असलियत है…जीवन का संघर्ष है या कहे जीवन का पूरा निचोड है… 1. ... Read More »

बूझो तो उसका नाम

देखो वह सांवला जोशीला पहने सादी पेंट और जिस पर सफेद कमीज आंखों पर पहने मोटा चश्मा पैरों में पहने कपड़े के जूते और कंधे पर डाले झोला वह कौन ? मस्त, मनमोहन चाल से चला जाता बूझो तो उसका नाम। लोग कहते कि वह कॉलेज में बच्चों को इंग्लिश पढ़ाता पर बच्चे कहते कि वह हमें जीवन जीना सिखाता ... Read More »

आज भी बोलता है डॉ सिद्धू का कमरा

नाटककार की दो दुनिया होती है। एक बाहर की और एक अंदर की। बाहर की दुनिया में आदमी लोक-लाज, समाज-व्यवहार इत्यादि में उलझा होता है किंतु अंदर की दुनिया यानी घर के उस खास कमरे की दुनिया अलहदा होती है। यहां आदमी सिर्फ खुद का होता है। खुद में जीता और खुद में हारता है। यहीं रचा जाता है वह ... Read More »