Saturday, August 19, 2017
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Tag Archives: फिल्म समीक्षा

‘मसान’ फिल्म नहीं भावनाओं का बनारस है…

‘मसान’ मतलब श्मशान । श्मशान यानि मृत्यु। मृत्यु माने सुख-दुख, मोह-माया से मुक्ति! लेकिन ‘मसान’ फिल्म मृत्यु,- मुक्ति की बात नहीं करती है, बल्कि बनारस के मसान के आसपास सांसे लेती जिंदगियों के इंद्रधनुषी रंगों की बात कहती है। उनके संघर्ष की बात करती है। उनकी भावनाओं को शब्द देती है। उनके दु:खों को बयान करती है। उनके प्यार की ... Read More »

ठेठ मुम्बईया फिल्म है गुड्डू रंगीला

अगर आपने फ़िल्म ‘गुड्डू रंगीला’ नहीं देखी है तो समझिए आप बहुत कुछ मिस कर रहे हैं. यक़ीन मानिये ये कोई आर्ट टाइप की फ़िल्म नहीं है. जो आम दर्शकों का मनोरंजन ना करे. बल्कि ये ठेठ मुम्बईया हिंदी फ़िल्म है. जो आपको इंटरटेन करने के साथ ही एक जरुरी मुद्दे पर बात भी करती है. ये काम डायरेक्टर सुभाष ... Read More »

हमारी अधूरी कहानी: दिल से जीने का हौसला देती है

इस फिल्म को आधी-अधूरी कहानी के सहारे प्रेम की पवित्रता को कहने, समझने या दिखाने की एक कोशिस कहा जा सकता है. फिल्म कुछ-कुछ टुकड़ो में अच्छी लगती है तो कुछ जगह जाकर उलझी हुई लगने लगती है. फिल्म को लेकर मोहित सूरी खुद ही उलझे हुए लगते हैं. ऐसे में बतौर निर्देशक वो ठीक ढंग से बता नही पाये ... Read More »

दिल की धड़कनों का संगीत सुनाती फिल्म

दिल तो वैसे चौबीसों घंटे धड़कता ही रहता है। मगर निर्देशक जोया अख़्तर की यह फ़िल्म देखकर दिल की धड़कनों को गिनने का हुनर मिलता है, बशर्ते आप मुहब्बत और आजादी की बेचैनियों को जाननें के सच्चे तलबगार हो। यह फ़िल्म अभिजात्य/कुलीन वर्ग के लोगों की जिंदगी में पसरें खामोश सन्नाटे और रिश्तों के बुनावट की महीन पड़ताल करती है। ... Read More »

‘पीकू’ : भविष्य से बात करती एक संवेदनशील फ़िल्म

सिनेमाई दर्शकों का कस्बाई या शहरी चरित्र भलें ही फंतासी को अधिक पसन्द करता हो उसके लिए मनोरंजन का खालिस अर्थ एक्शन,थ्रिल,कॉमेडी हो मगर फिर भी पीकू जैसी संवेदनशील फ़िल्म का बनना इस बात का संकेत है कि भले ही जोखिम हो मगर आज भी सिनेमा के जरिए अर्थपूर्ण विषयों पर संवाद करने का हौसला कुछ निर्माता निर्देशक रखते है।’पीकू’ ... Read More »

आंखों देखी: दर्शक के भीतर घटित होती फिल्म

निर्देशक रजत कपूर की फिल्म “आंखों देखी“ को देखने के लिए बाहर की बजाय भीतर की आंखों की ज्यादा जरूरत पड़ती है। जिन्हें मुख्यधारा का सिनेमा देखने की आदत है, उनके लिए यह फिल्म ज्यादा मायने नहीं रखती, लेकिन जो सिनेमा में खुद को घटित होते देखना चाहते हैं उनके लिए यह अनिवार्य फिल्म है। फिल्म अपने साथ अनूठे दर्शन ... Read More »