Wednesday, December 13, 2017
अभी अभी

मिल गयी ”एंटीइनटॉलरेंस” दवा

व्यंग्य यात्रा-

ग्लोबलवार्मिंग ने जलवायु परिवर्तित कर दिया है  , इतना कि हमारे देश में अब कोई मौसम अपने सही समय पर आता ही नहीं।  आता है तो छप्पर फाड़ कर आ जाता है,  नहीं आता तो छप्पर तक सूख के भरभरा कर गिर जाती है। कहीं कही तो सर्दी और गरमी एक साथ हो जाती है कभी कभी ऐसा हो जाता है कि पता ही नहीं चलता कि  मौसम है कौनसा ।  इससे होता यह है कि  मौसमी बीमारियां पैदा होने लगती  है , नई नई बीमारियां फैलती हैं। और हाहाकार मच जाता है।  इन दिनों ऐसी ही एक नई बीमारी से पूरा देश पीड़ित है।  यह किसी संक्रामक रोग की तरह फैली  है , और ढूंढ ढूंढ कर उन लोगो पर आक्रमण कर रही  है जो इस देश में शख्सियत के तौर पर जाने-पहचाने जाते हैं।  फिर उनके जरिये यह लोगो को अपनी गिरफ्त में लेती  जा रही  है।  सरकार परेशान है , लोग परेशान है किन्तु कोई इलाज नहीं मिल रहा है।
inअसहिष्णुता। अंगरेजी वाले इसे ‘इनटॉलरेंस’ के नाम से पहचानते हैं।  मुझे इसका पता तब चला जब कल मेरे पड़ोसी ने मुझे बताया कि भाईसाहब जीना मुहाल होने लगा है। मैं हैरान हुआ।  पूछा – क्या हुआ ? आप तो खुशहाल रहते हैं , कभी गम नहीं दिखा,आज ऐसा क्या हो गया कि जीना ही कठिन हो गया है ? उन्होंने बताया – क्या बताऊँ भाईसाहब , इनटॉलरेंस फ़ैल गया है।  मैंने कहा ; ये क्या है ? उन्होंने धीरे से कान के पास अपना  बगैर मंजन किया हुआ मुंह सटा कर  बताया- घर में बीबी सीधे मुंह बात नहीं करती।  बच्चे अपनी मनमानी करते हैं।  और अखबार में देखो रोज रोज बड़े बड़े आदमी ‘इनटॉलरेंस’ से परेशान हैं।  कल ही मेरा बेटा स्कूल से आया और कहने लगा – पापा वो जो मैं अपनी स्कूल रनिंग रेस में जीता था न , वो जो कप मिला था न , उसे वापस करना पडेगा।  मैंने पूछा ; क्यों ? तो उसने बताया – पापा मेरे दोस्त लोग कहते हैं उस ट्रॉफी पर इनटॉलरेंस के जीवाणु चिपके हुए हैं।  वापस कर और इस बीमारी से बच।
मैंने अपनी नाक बंद की और उनके मुंह से दूर हुआ। सचमुच उनके मुंह के पास रहकर बात करना  टॉलरेट  नहीं कर पाना है।  मुझे लगा कि – नहीं , जरूर कुछ बात है। ये बीमारी जरूर फ़ैली है।
मैं इसकी पुख्ता जानकारी लेने अपने साहित्यकार मित्र के पास पहुंचा तो उन्होंने बताया – नहीं नहीं इन टॉलरेंस नहीं भाई , असहिष्णुता की बीमारी है।  मैंने कहा – बात तो एक ही है न।  उन्होंने कहा- नहीं बात एक कैसे हो सकती है , यह हिन्दी वाली बीमारी है।  देखिये हमारे देश में हिन्दी की आज क्या हालत हो गयी है।  अंगरेजी वालों ने हमें परेशान कर रखा है भाई।  कोई हमें पूछता ही नहीं।  अरे हमारा नाम लेने वाला कोई नहीं है आज।  प्रकाशक हो या कोई भी , हम हिन्दी के लेखको की कोई औकात नहीं है भाई।  बहुत असहिष्णुता है।  मैंने तो सोचा है कि मैं अपना नाम चमकाने के लिए , वो गणेश पंडाल में पिछले साल मुझे जो साहित्यिक अवार्ड मिला था न , वो लौटा दूँ।  मैंने पूछा – इससे क्या होगा ? उन्होंने बताया – इससे सरकार पर दबाव पडेगा।  लोग मुझे पहचानेंगे।  मेरा नाम होगा।  मेरे साथ साथ और भी लोग ऐसा करेंगे।  हमारा एक गुट तैयार होगा।  हम अपनी बात रखेंगे।  मीडिया में नाम आएगा, चैनलों पर बहसें होगी।  एकदम भिन्नाट  आइडिया है  मेरे यार।
मैंने पूछा – मतलब आप इस बीमारी का लाभ उठाना चाह रहे हैं ? वे उठे और अपने कमरे की खिड़की से गली में ऐसी पान की पीक वाली पिचकारी चलाई कि सामने वाले के घर की दीवार तक पहुँची।  यह देख मुझे काफी असहिष्णुता महसूस हुई।  वो लौट कर आते और मुझे बताते , मैं उठा और वहां से चलते बना।  सोचा सचमुच असहिष्णुता है। घर आया और दरवाजे पर पैर रखा ही था कि  बीवी ने जोरदार आवाज में पूछा – कहाँ गए थे  सुबह सुबह ? आपको दूध लेकर आने को कहा था न , आप हैं कि कोई काम की बात याद रखते ही नहीं।  ये सब क्या लगा  रखा है ? मैं दिन दिन भर घर में पिसती रहूँ और एक आप हैं मजे से घूमते रहते हैं।  मैं चुपचाप रहा , क्योंकि जानता था बोला कि उसके भी दो दो अर्थ निकाल कर मुझ पर वो बरसेगी।  सच में जीना मुहाल हो गया है यार।  बीवी भी टॉलरेट नहीं कर पा रहा हूँ।  क्या करू? ये तो सचमुच इन टॉलरेंस की बीमारी है। चुपचाप जाकर अपने कमरे में रखी कुर्सी पर पसर गया , सामने रखे अखबार को उठाकर पढने लगा।  यह काम बीवियों का जवाब है।  वो जल भून कर आखिरकार चुप हो जाती है।  ज्यादा से ज्यादा मक्कार ही कहेगी न और क्या।  अखबार के पहले पेज  पर ही बड़ी सी खबर थी – देश में बढ़ रही है असहिष्णुता, और मोदी सरकार चुप है। मैंने सोचा जरूर मोदी सरकार मेरी तरह ही होगी कि चुप है।  फिर आगे पढने लगा – क्योंकि वही एकमात्र कारण है असहिष्णुता को बढ़ावा देने के लिए।  उनके मंत्री – संत्री सब असहिष्णुता फैला रहे हैं।  देश के बुद्धिजीवी हों या कलाकार , या फिर वैज्ञानिक हों या साहित्यकार सब देश में फ़ैल गयी असहिष्णुता से परेशान है।
मेरा दिमाग सन्न था।  यार बीवी से नहीं पटती तो इसमे सरकार की क्या गलती ? इतना सारा आरोप , इतना भयंकर विरोध , क्या यह सरकार के प्रति असहिष्णुता नहीं है ? सचमुच यह रोग है।  इसका इलाज भी तो कोई बापड़ा खोज नहीं रहा।  कोई इसका टीका ही ईजाद कर दे भाई  कि सुबह और शाम एक एक इंजेक्शन लगाओ और असहिष्णुता या इन टॉलरेंस से दूर रहो।  एंटी इन टॉलरेंस जैसी कोई दवा ही कोई बना दे।  और अगर मैं ही बनाने की सोच लूँ  तो इस  मार्केट में मुनाफ़ा बहुत होगा ? है न।  अरे ये तो बैठे बैठे ऐसा आइडिया मिल गया कि पूछो ही मत।
उस वक्त पता नहीं क्या हो गया मुझे।  खुशी से झूम उठा और दौड़ कर अपनी बीवी को गोद  में उठा लिया।  बीवी यह देख खुश हो गयी , उसने कहा – कितने सालों बाद आपने ऐसा किया है। अब तो बूढ़े हो गए हम  शर्म नहीं आती , बच्चे देखेंगे तो क्या कहेंगे।  ओहो , लजाती हुयी बीवी को देख मन प्रसन्न हो गया।  असहिष्णुता ख़त्म हो गयी।  मैंने पाया कि बात तो कुछ थी भी नहीं , फिजूल ही मैं इनटॉलरेट होता जा रहा हूँ।  सबकुछ ठीक है मगर कुछ भी ठीक नहीं जैसा माहौल खड़ा है। अपनी दूकान खूब चलेगी भिया , एंटी इनटॉलरेंस की दवा से। हा हा हा  इलाज मिल गया है ।  यूरेका यूरेका यूरेका चिल्लाते हुए बीवी को गोद में लेकर नाचने लगा। 

– सीमा श्रीवास्तव 

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