रायपुर (खबरगली) छत्तीसगढ़ में फार्मेसी शिक्षा को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। कभी युवाओं के बीच रोजगारपरक और बेहतर करियर विकल्प के रूप में देखे जाने वाले बैचलर ऑफ फार्मेसी (बी.फार्म) और डिप्लोमा इन फार्मेसी (डी.फार्म) जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के प्रति विद्यार्थियों का रुझान कम होता नजर आ रहा है। प्रदेश में इन दोनों पाठ्यक्रमों की करीब 6000 सीटें खाली रह जाने से फार्मेसी शिक्षा और इससे जुड़े रोजगार के अवसरों को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पढ़ाई पर हजारों रुपये खर्च करने के बाद भी बेहतर नौकरी और सम्मानजनक वेतन की अनिश्चितता विद्यार्थियों को इस क्षेत्र से दूर कर रही है।
बी.फार्म और डी.फार्म की हजारों सीटें खाली
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में बी.फार्म की कुल 4000 सीटों में से करीब 2200 सीटें खाली हैं। वहीं, डी.फार्म की 8000 सीटों में से लगभग 3800 सीटों पर प्रवेश नहीं हो पाया है। इस तरह दोनों पाठ्यक्रमों को मिलाकर करीब 6000 सीटें खाली रह गई हैं। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब फार्मेसी को स्वास्थ्य सेवाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है और दवाओं के निर्माण से लेकर उनके सुरक्षित वितरण तक प्रशिक्षित पेशेवरों की भूमिका अहम होती है।
विद्यार्थियों को प्रवेश का अतिरिक्त अवसर
सीटें खाली रहने के बाद विद्यार्थियों को प्रवेश का अतिरिक्त अवसर देने के लिए संस्थागत चरण के माध्यम से दाखिले की अनुमति दी गई है। प्रवेश के लिए 30 अक्टूबर की अंतिम तिथि निर्धारित की गई है। अब देखना होगा कि इस अतिरिक्त अवसर के बाद कितने विद्यार्थी फार्मेसी पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेते हैं और खाली सीटों की संख्या में कितनी कमी आती है।
रोजगार के सीमित अवसरों से कम हो रहा आकर्षण
फार्मेसी एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने इस स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि उच्च शिक्षा के विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में विद्यार्थियों की घटती संख्या पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। फार्मेसी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में सीटों का खाली रह जाना शिक्षा व्यवस्था और रोजगार के बीच के अंतर को भी सामने लाता है।
पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं
फार्मेसी की पढ़ाई पूरी करने के बाद पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं होना और प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े कठिन नियम विद्यार्थियों की घटती रुचि के प्रमुख कारण हो सकते हैं। यदि किसी पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के बाद विद्यार्थियों को अपने भविष्य को लेकर स्पष्टता नहीं मिलती, तो वे दूसरे विकल्पों की ओर रुख करने लगते हैं। ऐसे में सरकार और संबंधित विभागों को इस समस्या के कारणों का आकलन कर जरूरी कदम उठाने चाहिए।
पढ़ाई पर खर्च के बाद भी नौकरी की गारंटी नहीं
फार्मेसी पाठ्यक्रमों में विद्यार्थियों की रुचि कम होने के पीछे रोजगार और वेतन से जुड़ी चुनौतियां भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। निजी संस्थानों में पढ़ाई के दौरान फीस, किताबों, परीक्षा और अन्य शैक्षणिक जरूरतों पर खर्च करना पड़ता है। ऐसे में विद्यार्थी और उनके अभिभावक स्वाभाविक रूप से उम्मीद करते हैं कि पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें बेहतर रोजगार मिल सकेगा।
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