अब ट्रेनें बिजली खाएंगी नहीं बनाएंगी
नई दिल्ली (खबरगली ) रेलवे ट्रैक पर दौड़ती ट्रेन की आवाज और पटरी की थरथराहट अब सिर्फ शोर या कंपन नहीं रह जाएगी। यही कंपन आने वाले समय में बिजली का स्रोत बन सकती है। रिसर्चर्स ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जो भारी ट्रेन के गुजरने से रेलवे ट्रैक में पैदा होने वाली हलचल को विद्युत ऊर्जा में बदल सकती है। सबसे खास बात यह है कि इस बिजली का इस्तेमाल रेलवे ट्रैक पर लगे लो-पावर सेंसर को चलाने में किया जा सकता है। यानी जिस कंपन को अब तक ऊर्जा की बर्बादी माना जाता था, वही रेलवे की निगरानी व्यवस्था को पावर देने में काम आ सकती है।
ट्रेन गुजरेगी और पटरी से निकलेगी बिजली!
जब कोई भारी ट्रेन पटरी से गुजरती है तो उसके वजन और पहियों की गति से ट्रैक में लगातार कंपन पैदा होता है। पटरी हल्की-सी ऊपर-नीचे होती है। आमतौर पर इस कंपन में मौजूद ऊर्जा उपयोग में नहीं आती और आसपास के वातावरण में अलग-अलग रूपों में dissipate हो जाती है। नई तकनीक इसी बर्बाद होने वाली ऊर्जा को पकड़ती है और उसे बिजली में बदल देती है।
पटरी की ऊपर-नीचे गति कैसे बनेगी रोटेशन?
इस सिस्टम का सबसे दिलचस्प हिस्सा इसका मैकेनिकल कन्वर्जन सिस्टम है। इसमें सीजर लिंकेज और स्लाइडर मैकेनिज्म का इस्तेमाल किया गया है। ट्रेन के गुजरने पर जब पटरी ऊपर-नीचे होती है, तो यह मैकेनिज्म उस गति को एकतरफा घूर्णन यानी रोटेशन में बदल देता है। इसके बाद यही रोटेशन जनरेटर को चलाता है और बिजली पैदा होती है।
तीन हिस्सों में काम करता है पूरा सिस्टम
इस नई तकनीक को मुख्य रूप से तीन मॉड्यूल में बांटा गया है।
1. वाइब्रेशन कन्वर्जन मॉड्यूल
यह पटरी में पैदा होने वाली ऊपर-नीचे की कंपन गति को मैकेनिकल रोटेशन में बदलता है।
2. जनरेटर मॉड्यूल
मैकेनिकल रोटेशन को थ्री-फेज जनरेटर विद्युत ऊर्जा में बदलता है।
3. पावर स्टोरेज मॉड्यूल
जनरेट हुई बिजली को रेक्टिफिकेशन और फिल्टरिंग के बाद सुपरकैपेसिटर में स्टोर किया जा सकता है, ताकि जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल किया जा सके।
73.38% एफिशिएंसी, 7.44 वॉट तक पहुंचा पावर आउटपुट
रिसर्च के दौरान सिस्टम की टेस्टिंग की गई और इसके प्रदर्शन से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े सामने आए। परीक्षण में इसकी 73.38 प्रतिशत एफिशिएंसी दर्ज की गई। वहीं, सिस्टम ने 7.44 वॉट का पीक पावर आउटपुट हासिल किया। यह आउटपुट छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और कम बिजली खपत वाले सेंसर के लिए उपयोगी हो सकता है।
रेलवे के सेंसरों को बार-बार बैटरी बदलने से मिल सकती है राहत
रेलवे ट्रैक की सुरक्षा और स्थिति पर नजर रखने के लिए अलग-अलग तरह के सेंसर लगाए जाते हैं। ये सेंसर ट्रैक की स्थिति से जुड़ा डेटा रिकॉर्ड करने में मदद कर सकते हैं। ऐसे उपकरणों को लगातार बिजली उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, खासकर उन जगहों पर जहां नियमित बिजली कनेक्शन या वायरिंग आसान नहीं है।
यहीं काम आएगी कंपन से बिजली बनाने वाली तकनीक
अगर ट्रैक पर चलने वाली ट्रेनें ही इन सेंसरों के लिए जरूरी ऊर्जा पैदा कर दें, तो अलग से बिजली पहुंचाने या बैटरी बदलने की जरूरत कम हो सकती है। इस तरह सेंसर ट्रेन के गुजरने से पैदा होने वाली कंपन से ऊर्जा हासिल कर सकते हैं और उसे अपने संचालन के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।
धूप नहीं, हवा नहीं… ट्रेन आएगी तो ऊर्जा बनेगी
सोलर पैनल के लिए धूप और विंड टर्बाइन के लिए हवा की जरूरत होती है। इसके मुकाबले यह सिस्टम ट्रेन की आवाजाही से पैदा होने वाली कंपन ऊर्जा पर निर्भर करता है। यानी जहां नियमित रूप से ट्रेनों की आवाजाही होती है, वहां हर ट्रेन संभावित रूप से इस सिस्टम के लिए ऊर्जा का एक नया अवसर बन सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रेनें अब अपनी पूरी ऊर्जा खुद पैदा करने लगेंगी। मौजूदा तकनीक का उद्देश्य मुख्य रूप से लो-पावर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और रेलवे मॉनिटरिंग सेंसरों के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराना है।
स्मार्ट रेलवे की दिशा में बन सकता है अहम कदम
रेलवे लगातार ऐसे सिस्टम विकसित करने की दिशा में बढ़ रहा है, जिनसे ट्रैक और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर की निगरानी ज्यादा स्मार्ट और रियल-टाइम तरीके से की जा सके। पटरी की कंपन से बिजली बनाने वाली तकनीक इस दिशा में एक दिलचस्प विकल्प पेश करती है। यदि भविष्य के परीक्षणों में यह तकनीक अलग-अलग परिस्थितियों में टिकाऊ और किफायती साबित होती है, तो रेलवे ट्रैक पर लगे छोटे सेंसरों के लिए इसका इस्तेमाल बढ़ाया जा सकता है।
पटरी का कंपन बनेगा डेटा और बिजली, दोनों का जरिया
इस तकनीक की खासियत यही है कि ट्रेन के गुजरने से पैदा होने वाली ऊर्जा को बेकार जाने देने के बजाय उसका उपयोग किया जा सकता है। इससे रेलवे के लिए सेल्फ-पावर्ड सेंसर नेटवर्क की संभावना मजबूत हो सकती है। हालांकि बड़े स्तर पर इस्तेमाल से पहले सिस्टम की लागत, रखरखाव, लंबे समय तक विश्वसनीयता और अलग-अलग ट्रैक परिस्थितियों में प्रदर्शन की जांच जरूरी होगी।
आखिर कितनी बड़ी है यह तकनीक?
फिलहाल इसे ऐसी तकनीक के रूप में देखा जाना ज्यादा उचित है जो छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और रेलवे सेंसरों को ऊर्जा देने में मदद कर सकती है। 73.38 प्रतिशत एफिशिएंसी और 7.44 वॉट के पीक आउटपुट ने इसके संभावित उपयोग को जरूर दिलचस्प बना दिया है। आने वाले समय में अगर इस तकनीक को बड़े स्तर पर सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो रेलवे की पटरियों पर दौड़ने वाली हर ट्रेन सिर्फ यात्रियों और सामान को ही नहीं, बल्कि स्मार्ट रेलवे सिस्टम के लिए थोड़ी ऊर्जा भी पैदा कर सकती है।
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