आपातकाल की आंच से तपकर निखरा एक रिश्ता: जब लोकतंत्र की रक्षा के लिए जेल गए दूल्हे का संत पवन दीवान ने कराया विवाह

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संविधान हत्या दिवस की 51वीं बरसी पर पर पढ़ें लोकतंत्र सेनानी स्वर्गीय वीरेंद्र दीपक के जीवन वृतांत का एक रोचक अंश

खबरगली (साहित्य डेस्क )

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इस तस्वीर को ध्यान से देखिए। यह मई 1977 की तस्वीर है, जब रायपुर (छत्तीसगढ़) के केंद्रीय जेल से मीसा (MISA) के तहत 19 महीने तक बंदी रहे लोकतंत्र सेनानियों को रिहा किया गया था। आपातकाल की अमानवीय यातनाएँ सहने के बाद जेल से बाहर निकलते इन चेहरों पर लोकतंत्र की जीत की मुस्कान साफ़ दिखाई देती है। इस तस्वीर में जनसंघ के अनेक वरिष्ठ नेता उपस्थित हैं, जिनमें स्वर्गीय बाबू पंडरी राव कृदत्त जी, स्वर्गीय पंडित हनुमान प्रसाद मिश्रा जी, स्वर्गीय शारदा प्रसाद शर्मा जी, स्वर्गीय सोम प्रकाश गिरी जी, स्वर्गीय जयंतीलाल गांधी जी, स्वर्गीय विट्ठल राव म्हस्के जी (दीपक म्हस्के जी के पूज्य पिताजी) और हमारे पूज्य पिताजी स्वर्गीय वीरेंद्र दीपक जी प्रमुख रूप से दिखाई दे रहे हैं।

इस तस्वीर के पीछे हमारे परिवार की एक ऐसी कहानी छिपी है, जिसे याद करते हुए आज भी मन भावुक हो जाता है।

यह कहानी साल 1975 की है, जब देश की राजनीति और एक आम परिवार का भविष्य एक ऐतिहासिक मोड़ पर आमने-सामने खड़े थे। महासमुंद-राजिम क्षेत्र में छात्र आंदोलनों की अगुवाई कर रहे और पत्रकारिता के जरिए जन-जागरण में जुटे एक निर्भीक युवा का रिश्ता एक प्रतिष्ठित परिवार में तय हुआ था। लड़की के पिता (नानाजी) एक सरकारी शिक्षक थे और लड़की खुद उस समय कॉलेज में पढ़ाई कर रही थी। महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और मनीषी पंडित सुंदरलाल शर्मा जी के प्रतिष्ठित परिवार की साख को देखते हुए नानाजी ने इस रिश्ते को सहर्ष स्वीकार किया था।

आपातकाल का क्रूर प्रहार और गिरफ्तारी

विवाह की तैयारियाँ अभी शुरू ही होने वाली थीं कि 25 जून 1975 को देश का इतिहास बदल गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया। संविधान की आत्मा को कुचलकर लोकतंत्र पर अब तक का सबसे बड़ा प्रहार किया गया। देश में हाहाकार मचा था, ऐसे में देशभक्त और निर्भीक स्वभाव के वह युवा (पिताजी) भला कैसे चुप बैठते? वे भी लोकतंत्र की रक्षा के आंदोलन में कूद पड़े। उनके आंदोलन, प्रखर विचार और तीखी लेखनी तत्कालीन सरकार को चुभने लगी। इसका परिणाम यह हुआ कि 25 अक्टूबर 1975 को मात्र 26 वर्ष की आयु में उन्हें 'मीसा' (MISA - Maintenance of Internal Security Act) के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। घरवाले इस बात से पूरी तरह अनजान थे और उन्हें गिरफ्तारी की सूचना काफी बाद में मिली।

एक मध्यमवर्गीय परिवार का संकट और अनिश्चितता

जब इस गिरफ्तारी की खबर नानाजी तक पहुँची, तो एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार के सरकारी शिक्षक के लिए यह स्थिति पहाड़ टूटने जैसी थी। होने वाला दामाद जेल में बंद था। उस दौर में डर और पाबंदियों का ऐसा माहौल था कि किसी को यह स्पष्ट नहीं था कि उनका अपराध क्या है। चारों तरफ फैली अनिश्चितता, सामाजिक दबाव और बेटी के भविष्य की चिंता के बीच आखिरकार भारी मन से परिवार ने एक बड़ा निर्णय लिया—यह विवाह अब नहीं होगा। रिश्ते की डोर टूटती नजर आने लगी।

संत कवि पवन दीवान बने संकटमोचक

लेकिन नियति ने इस रिश्ते की किस्मत में कुछ और ही लिखा था। इस कठिन समय में छत्तीसगढ़ के महान संत-कवि पवन दीवान जी, जिन्हें माताजी आदर से 'मामा' कहती थीं, इस संकटग्रस्त परिवार के लिए तारणहार बनकर सामने आए। एक दिन राजिम में उनकी मुलाकात नानाजी से हुई। नानाजी की चिंता को समझते हुए पवन दीवान जी ने उन्हें ढाँढस बँधाया और समझाया। उन्होंने कहा, "वह कोई अपराधी नहीं है, बल्कि देश के लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी आहुति देने वाला एक युवा क्रांतिकारी है।" दीवान जी ने नानाजी को देश के बदतर हालातों से रूबरू कराते हुए बताया कि इस समय पूरे देश में एक लाख से अधिक देशभक्त केवल लोकतंत्र बचाने के 'अपराध' में जेलों में बंद हैं, जिनमें देश के कई बड़े राष्ट्रीय नेता भी शामिल हैं।

गर्व में बदला डर और एक ऐतिहासिक मिलन

संत पवन दीवान जी की इन बातों ने नानाजी के मन से डर का कुहासा पूरी तरह साफ कर दिया। उनकी सोच बदल गई और जिस दामाद के जेल जाने से वे चिंतित थे, उसके प्रति उनका सम्मान और गर्व कई गुना बढ़ गया। नानाजी ने न केवल रिश्ता दोबारा कायम रखा, बल्कि गर्व से दामाद की रिहाई का इंतजार करने लगे। आपातकाल का वह काला दौर बीता और पिताजी जेल से रिहा हुए। इसके बाद, 11 दिसंबर 1977 को पूरे हर्षोल्लास, गरिमा और मान-सम्मान के साथ दोनों का विवाह संपन्न हुआ। यह विवाह केवल दो दिलों का मिलन नहीं था, बल्कि वैचारिक दृढ़ता, देशभक्ति के प्रति सम्मान और एक अडिग पारिवारिक विश्वास की जीत थी। नानाजी की खुशी उस समय और भी बढ़ गई, जब पिताजी ने स्पष्ट शब्दों में दहेज लेने से इनकार कर दिया। विवाह में उन्होंने केवल एक रुपये का शगुन स्वीकार किया। ऐसे स्वाभिमानी और सिद्धांतवादी दामाद को पाकर नानाजी जीवनभर गर्व महसूस करते रहे। सन् 2001 में पिताजी के निधन के बाद भी नानाजी हमें उनके संघर्ष, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की कहानियाँ सुनाकर प्रेरित करते रहे।

आपातकाल केवल लोकतंत्र की हत्या नहीं था। यह लाखों परिवारों के सपनों, रिश्तों और जीवन पर लगा गहरा घाव था। मीसा बंदियों और उनके परिवारों ने जो पीड़ा, अपमान और अन्याय सहा, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय है। विडंबना यह है कि आज संविधान की रक्षा की बात करने वाली कांग्रेस ने ही उस समय संविधान की आत्मा का सबसे बड़ा गला घोंटा था।

संविधान हत्या दिवस की 51वीं बरसी पर लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले सभी लोकतंत्र सेनानियों को विनम्र श्रद्धांजलि। अपने पूज्य पिताजी, स्वर्गीय वीरेंद्र दीपक जी को शत-शत नमन।

                                             -उज्जवल दीपक

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