डॉ. लोकेश शरण की पुस्तक “भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की क्रांतिकारी धाराएं” का गरिमामय विमोचन, क्रांतिकारी इतिहास की प्रमाणिकता पर हुआ सार्थक विमर्श
रायपुर (खबरगली ) श्लोक ध्वनि फाउंडेशन एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वाधान में डॉ. लोकेश शरण की नवीन कृति “भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की क्रांतिकारी धाराएं” का विमोचन समारोह वृंदावन हॉल, सिविल लाइन, रायपुर में गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ सामूहिक रूप से “वंदे मातरम्” गीत के गान से किया गया, जिसने पूरे वातावरण को राष्ट्रभाव से ओत-प्रोत कर दिया। कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ लोकेश शरण ने कहा कि बचपन से ही उन्हें क्रांतिकारियों की कहानियों से गहरा जुड़ाव रहा और शिक्षकों से मिली प्रेरणा ने इस दिशा में उन्हें आगे बढ़ाया। उन्होंने बताया कि क्रांतिकारियों के इतिहास को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया है। पत्रकार के रूप में लेखन अभ्यास ने उनके शोध को धार दी और उनके पुत्र ने इस पुस्तक लेखन के लिए प्रेरित किया।
डॉ वंश गोपाल ने कहा कि उन्होंने शोधार्थियों से अधिक ललक लोकेश शरण जी में देखी है। कई स्थानों पर जाकर शोध करना अत्यंत दुरूह कार्य है। उन्होंने पुस्तक के कवर पृष्ठ और नाम को ही रोमांचित करने वाला बताया तथा कहा कि इस पुस्तक को पढ़ने के लिए इतिहास का विद्यार्थी होना आवश्यक नहीं, क्योंकि इसमें इतिहासकार और पत्रकार दोनों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यह सच्चे इतिहास को उजागर करने वाली महत्वपूर्ण कृति है।
शशांक शर्मा ने कहा कि लेखक ने विषय विशेषज्ञता से आगे बढ़कर नया दृष्टिकोण और आयाम दिया है। उन्होंने कहा कि क्रांतिकारी इतिहास को पूरा और सत्य रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया, जबकि यह पुस्तक तथ्यों के आधार पर सच्चाई सामने रखती है। उन्होंने विशेष रूप से चौरा-चौरी कांड की पाँच पृष्ठों में की गई व्याख्या को उल्लेखनीय बताया।
डॉ ए डी एन वाजपेयी ने अपने उद्बोधन में कहा कि ऐसी पुस्तकों के माध्यम से लेखक भारत के महत्वपूर्ण इतिहासकार के रूप में प्रतिष्ठित होंगे। यह कृति स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई स्थापित अनुमानों को चुनौती देती है और प्रमाणिक इतिहास प्रस्तुत करती है। उन्होंने इसे इतिहास की भिन्न धाराओं को जोड़ने वाली तथा रोचक शैली में लिखी गई पुस्तक बताया, जो सहज ही जनमानस तक पहुँचेगी।
मुख्य अतिथि डॉ पूर्णेंदु सक्सेना ने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम देश को जोड़ने वाली शक्ति है और उसके सत्य एवं प्रमाणिक इतिहास से राष्ट्रीय अस्मिता का संचार होता है। उन्होंने कहा कि क्रांतिकारियों के आंदोलन की विशेषता हमारी मिट्टी में निहित है, जहाँ अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों ने अपने स्तर पर स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाया। “वंदे मातरम्” को उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति बताते हुए कहा कि साधक द्वारा किया गया क्षणिक कार्य भी युगों तक प्रभाव छोड़ता है। हमें क्रांतिकारियों के बलिदान को अपने जीवन का अंग बनाना चाहिए।
प्रश्न-उत्तर सत्र में डॉ. लोकेश शरण ने बताया कि उन्होंने छत्तीसगढ़ सहित विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक शोध कार्य किया तथा उपस्थित जनों के प्रश्नों के सारगर्भित उत्तर दिए। इस संवाद सत्र ने शोध प्रक्रिया, स्रोतों की प्रमाणिकता और क्रांतिकारी आंदोलन की विविध धाराओं पर गहन समझ विकसित की। कार्यक्रम का कुशल संचालन वरिष्ठ पत्रकार डॉ विश्वेश ठाकरे ने किया तथा आभार प्रदर्शन श्लोक ध्वनि फाउंडेशन के संस्थापक सदस्य श्री कुमार ने किया। आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल एक पुस्तक का विमोचन नहीं, बल्कि क्रांतिकारी चेतना के पुनर्स्मरण का महत्वपूर्ण अवसर है, जो नई पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति, इतिहासबोध और वैचारिक सजगता की दिशा में प्रेरित करेगा।
इस अवसर पर इतिहासकार एवं पुरातत्वविद डॉ रमेंद्र नाथ मिश्र, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा, आकाशवाणी रायपुर से जुड़े महेंद्र साहू, वरिष्ठ पत्रकार वैभव बेमेतरिहा, शिव प्रसाद मिश्रा, श्लोक ध्वनि फाउंडेशन के सुमित शर्मा, अनिल तिवारी, प्रभात मिश्रा, नितेश पाटकर एवं भुनेश्वरी जायसवाल सहित अनेक साहित्यप्रेमी, पत्रकार, शोधार्थी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। समारोह ने इतिहास, साहित्य और राष्ट्रचेतना के त्रिवेणी संगम का प्रभावी उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह संदेश दिया कि क्रांतिकारी परंपरा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की वैचारिक ऊर्जा का स्रोत है।
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