एक पढ़े लिखे युवा महंत सौरभ शर्मा की कहानी
रायपुर (खबरगली ) इतिहास गवाह है कि जब-जब कोई युवा सत्य के पक्ष में खड़ा हुआ है, तब-तब सत्ता ने उसे रोकने का प्रयास किया है। परंतु सत्य का एक अद्भुत गुण है—उसे दबाया जा सकता है, पराजित नहीं किया जा सकता। कल्पना कीजिए एक ऐसे युवक की, जिसकी आयु मात्र 24 वर्ष थी। उसके सामने सुरक्षित भविष्य के अनेक द्वार खुले थे। वह सिविल सेवा की तैयारी कर रहा था। वह आरामदायक जीवन चुन सकता था। परंतु उसने एक कठिन मार्ग चुना—सत्य का मार्ग। उसने समाज के सामने उन प्रश्नों को उठाने का साहस किया, जिन्हें उठाने से बड़े-बड़े लोग डरते थे। उसने पत्रकारिता को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम माना।
किंतु जब एक युवा निर्भीक होकर व्यवस्था से प्रश्न पूछता है, तब अक्सर उसे प्रशंसा नहीं, संघर्ष मिलता है। उसके जीवन में भी यही हुआ। तत्कालीन जोगी सरकार के नैतिक रूप से भ्रष्ट मंत्रियों के स्टिंग ऑपरेशन के बाद उसके विरुद्ध मुकदमे हुए, जेल के दरवाजे खुले, उसके सपनों का समाचार मंच उससे दूर हो गया। परिवार बिखर गया। आजीविका के साधन छिन गए। जिस आयु में लोग अपने भविष्य का निर्माण करते हैं, उस आयु में उसे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ी।
परंतु क्या यही अंत था? नहीं। क्योंकि वह केवल एक व्यक्ति नहीं था; वह एक विचार था। और विचारों को कारागारों में बंद नहीं किया जा सकता। जब संसार ने उसके लिए दरवाजे बंद किए, तब उसने मंदिर के द्वार खोल दिए। उसने एक वृद्ध और मरणासन्न उपेक्षित संत गोविन्द शरण दास की सेवा को अपना धर्म बना लिया। जिस महंत को लोग मरणासन्न छोड़ मंदिर की संपत्ति पर अवैध खदानें चला रहे थे, उनकी सेवा करके पुनर्जीवित किया , उसकी पीड़ा को अपना दर्द समझा और उसके सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष करके उनके अधिकार वापस दिलवाये।
यहीं से उसका दूसरा जन्म हुआ वह पत्रकार से कर्मयोगी बना, कर्मयोगी से सेवक और सेवक से संन्यासी। जब उसे महंत का दायित्व मिला, तब उसने मंदिर को केवल पूजा का स्थान नहीं माना। उसने उसे समाज जागरण का केंद्र बनाने का संकल्प लिया। उसने अन्याय और अतिक्रमण के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उसने यह संदेश दिया कि मंदिर केवल पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि समाज की आत्मा हैं।
संघर्ष फिर आया। विवाद आए, आरोप आए, कठिनाइयाँ आईं। स्वास्थ्य ने साथ छोड़ना चाहा। जीवन ने बार-बार परीक्षा ली। परंतु जिसने जेल देखी हो, जिसने अपमान देखा हो, जिसने अपना सब कुछ खोकर भी मुस्कुराना सीखा हो, उसे भय किस बात का?
तभी इस कठिन समय में कनीराम जी उनके संपर्क में आए। यहाँ से पुनर्जीवन के साथ उसने अपने बच्चों का पालन-पोषण किया। उसने अध्ययन जारी रखा। उसने नई तकनीकों को सीखा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता को समझा, मीडिया और समाजसेवा में कार्य किया। वह गिरा, पर रुका नहीं। वह थका, पर झुका नहीं।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था—“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”
कुछ जीवन ऐसे होते हैं जो इस वाक्य को केवल पढ़ते नहीं, जीते हैं। यह कहानी ऐसे ही एक संन्यासी की है। उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं कि उसने बहुत कुछ खोया। उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि वह जिस भारत का स्वप्न देखता था—शिक्षित, जागृत, नैतिक और आत्मविश्वासी भारत—वह अभी अधूरा है। परंतु उसकी सबसे बड़ी शक्ति भी यही है कि उसने स्वप्न देखना बंद नहीं किया।
हो सकता है कि व्यवस्था ने उसे रोकने का प्रयास किया हो। हो सकता है कि परिस्थितियों ने उसके मार्ग में काँटे बिछाए हों। परंतु जो व्यक्ति सत्य, सेवा और सनातन मूल्यों के लिए जीता है, उसकी पराजय केवल एक भ्रम होती है। क्योंकि अंततः विजय व्यक्ति की नहीं, विचार की होती है। और यदि विचार जीवित है, तो संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है।
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